History Of Yaduvansham

 History Of Yaduvansham 

विषय - भगवान श्री कृष्ण और मथुरा के यादवों पर उठे अनेको प्रश्नों के समीचीन उत्तर !



    — Raj Arya




नमस्ते जी


पाठकगणो! इस लेख में ऐतिहासिक प्रमाणों से ये सिद्ध किया जाएगा कि आज भगवान श्री कृष्ण को केवल नाम के गोपाल नहीं कहा जाता , वो और उनके मथुरा के यादव गोपाल हुआ भी करते थे । इसकी पूर्ण ऐतिहासिक समीक्षा इस लेख में होगी। 

मित्रों , काफी समय बाद हम ब्लॉग पर कोई लेख लिखने जा रहे है जिसे हो सकता है कुछ लोगों को शीर्षक पढ़कर कुछ समझ ना भी आ रहा हो लेकिन अंत तक पढ़ने के बाद ये आपके समक्ष प्रमाणित हो जाएगा की भगवान श्री कृष्ण के साथ अहीर गोपो का संबंध क्यों परंपरा से जोड़ा जाता है। इस लेख में सारे उत्तर प्रमाण आधारित ही होंगे हमारी claims कम से कम और लेख को अंत तक धैर्यपूर्वक पढ़े लेख काफी बृहद लिखा गया है । ये लेख प्रूव कर देगा कि भगवान श्री कृष्ण एक ग्वाले थे अहीर थे और क्षत्रिय भी थे तीनों एक साथ यादवों में। बहुत सारे लोग आज के लेख में दिए प्रमाणों को अपने जीवन में पहली बार जानेंगे और हम बता देवे इसी दबे हुए सत्य को भविष्यमें अकाट्य (सत्य) रूप में स्थापित करने हेतु ही ये लेख लिखने का निर्णय लिया है हमने अस्तु । बिना लेख को और विस्तार दिए अब हम आरम्भ करते है ‘यदुवंश का इतिहास’ । 
(टिप्पणी - लेख में प्रमाणों को चित्ररूप में जगह जगह इसलिए संलग्न किया गया है ताकि आप सीधे मूलग्रन्थ से ही इन प्रमाण स्रोतों को save करके आप कही भी दिखा सकते है और सरलता से उत्तर भी दे सकते है)**

यदुवंश की शुरुवात महाराज यदु जी से हुई थी वे चन्द्रवंश में राजा ययाति के सुपुत्र हुए है। मान्यता के अनुसार राजा ययाति नहुष और शिवपुत्री अशोकसुंदरी से हुए पुत्र थे तथा यदु के वंशजों को अपत्य अर्थ में ‘यादव’ कहा जाता है (ये कोई जाति नहीं) ‘यादव’ शब्द का हिंदी अर्थ सिर्फ इतना है ‘यदु के वंशज’।
 [कुछ लोगों का कहना होता है जो हमे सुनने को मिला , राजा यदु हो या भगवान श्री कृष्ण या अन्य यादव वे सभी क्षत्रिय थे तथा राज्य किया करते थे । फिर कहते है एक यादव कभी भी गोपालन नहीं कर सकता उसका अधिकार नहीं है , श्री कृष्ण भगवान के नाम के साथ गोप गोपाल जैसे शब्द नहीं लगाना चाहिए । उन्हें गोकुल में गोपों ने सिर्फ पाला था वास्तव में श्री कृष्ण एक क्षत्रिय थे कोई गोप नहीं थे ] आक्षेप चाहे जैसा हो भले हास्यास्पद हो लेकिन हम उत्तर देने का प्रयास करेंगे । इन दावों की न्याय दर्शन में वर्णित साधर्म्य - वैधर्म्य रीति तथा विभिन्न प्रकारो से फैक्ट चेक आज किया जाएगा। सर्वप्रथम महाभारत हरिवंश आदि इतिहास शास्त्रों की ओर बढ़ते है —






यहां आप पढ़ सकते है जिस महाराजा यदु के कथा की शुरुवात ही एक श्राप से बताई जाती है । जिसमें उन्हें और उनके वंशजों को राज्य न प्राप्त होने का इतिहास लिखा हुआ है या कहे राजा होते हुए भी समाज उनका राज अधिकार का तिरस्कार करता रहा । क्यों ? क्योंकि पिता ने ही राज्य से उन्हें निष्काषित कर दूसरे भाई पुरु को राज्य का उत्तराधिकारी माना । इसलिए यदु और उनके वंशजों के साथ भी ये तिरस्कार युक्त शब्द लंबे समय तक चल पड़ा । आप इस विषय में चाहे जो शास्त्र उठा ले आपको यदु से जुड़ी ठीक यही कथा मिलेगी । फिर न जाने आजकल कुछ लोग कहते है यदु को एक जगह राजा / क्षत्रिय से भी क्लेम करते है और दूसरी तरफ ये श्राप के बारे में इस इतिहास से किनारा कर लेते है। इसलिए इस दावे के मूल में ही एक बड़ा भूल हमे देखने मिलता है। यहां इन प्रमाणों को पढ़ने से तो यही ज्ञात हो रहा है कि , यदु के वंशज तो वे ही होंगे जिन्हें राजा होते हुए भी वो सम्मान कभी प्राप्त नहीं हुआ उदाहरण के लिए भगवान कृष्ण और भगवान बलराम , इनको द्वारिका नगरी प्राप्त होकर भी लोग ग्वाले चरवाहे ही सदा समझते रहे । उन्हें इस बात से तनिक भी खेद न हुआ इसके बावजूद भगवान कृष्ण सदा मोर मुकुट धारण करते हुए जीवन पर्यंत रहे जो कि ब्रज के गोप संस्कृति का एक पहचान हुआ करती थी।

चलिए अब हम भगवान श्री कृष्ण महाराज के पूर्वजों का इतिहास आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे । क्या उनका कोई अभीरो से संबंध था या नहीं ये देखेंगे, वो भी महाभारत के खिल भाग हरिवंश से -

V.v.v.v.imp note - श्री कृष्ण इस 37 वे अध्याय में यौवन अवस्था को प्राप्त हो चुके है ***

हरिवंश पुराण : विष्णु पर्व : अध्याय 37

यहां श्री कृष्ण के पूर्वज राजा हरयश्व के एक असुर कन्या से विवाह का उल्लेख है वो उन्हें अपना राज्य देते है । बड़ी ही interesting है न ये स्टोरी ययाति भी एक असुर शुक्र आचार्य से विवाह करते है और इनके पुत्र का यहां भी में यदु के नाम से वर्णन हुआ है -


कुछ दिखा ? अभीरो का संबंध तो भगवान कृष्ण के पूर्वजों से शुरू से ही था और ये हरिवंश में ही लिखा हुआ है। हम अगर राजा हरयश्व को ययाति जी का ही अन्य नाम माने या न भी माने , तब भी हरयश्व ने जिस राज्य पर शासन किया था वह अभिरो और साथ गौ से समृद्ध देश (आज का गुजरात) ही लिखा है। जिस वंश का ही अभीरो से संबंध इतना प्राचीन रहा हो उस यादव वंश को आप अभीरो से अलग बोल रहे हो ? उन्हें यादवों से भिन्न दिखा रहे हो ? अभीर का संबंध भगवान श्री कृष्ण ही नहीं उनके पूर्वजों से ही जुड़ा हुआ है ये प्रमाण यदुवंशियों भाइयों के लिए अकाट्य प्रमाण है।



कई लोग कहते है अभीरो ने वृष्णिकुल की कन्या को हर लिया । अगर वे वृष्णि कुल के होते तो उन्हें अभीर अलग और वृष्णि कुल अलग क्यों लिखा हुआ है ? 
उत्तर : यदि अभीर को उस समय आप केवल पेशा मानते हो फिर इन्हें दूसरे वास्तविक यदुवंशी अभीरो से समान क्यों ले रहे हो ? उन्हें अलग मान सकते थे पर प्रोपेगंडा रचने के समय क्यों याद आएगा पेशा वाली बात ?
दूसरा मत कुछ लोग १६००० पत्नियों को नहीं मानते फिर वे इस प्रसंग को मिलावट क्यों नहीं मानते ?
तीसरा मत जो तुम कहो कि अभीर यादव एक जगह में अलग लिखने से कुल भेद सिद्ध होता है तो ऊपर दिए गए प्रमाण में यादव और वृष्णि कुल अलग अलग वंश लिखे है जबकि श्री कृष्ण तो वृष्णि वंशी होते हुए यादव थे फिर ? वास्तव में वहां अभीरो में जो लुटेरे दुष्ट कौरव सेना पक्ष के अभीर थे उनका ही वर्णन हो रहा है उन्होंने अनजाने में अर्जुन से प्रतिशोध लेने के इच्छा से यदुवंशी स्त्रियों को भी लुट लिया। इसे विस्तार से आगे सिद्ध करूंगा।
चौथा मत आधा काट छटकर क्यों बताते हो वो एक लीला थी यादव ही यादवों का नाश किया था इसलिए अभीर ने उन्हें लूटा ये दैवी लीला थी आगे देखे गीता से -


यहां आप देख सकते है श्रीभगवद्गीता 1.41 श्लोक में श्री कृष्ण को वृष्णि वंशी कहा गया है। क्या वे इसी कुतर्क से यादव और वृष्णि अलग हो जाएंगे ? 



अब देखिए श्री कृष्ण दक्षिण दिशा में जाते है वहां भी यादव वंश के लोग पहले से राज्य कर रहे है (जो समझते है द्वारिका में यादव मारे गए तो बाकी यादव कहा से आए ? उन्होंने कुछ नहीं पढ़ा होता है) -



अब देखिए हमने ऊपर कहा था श्री कृष्ण इस समय युवा अवस्था के हो चुके थे अब देखिए जबरदस्त प्रमाण -


हरिवंश के इस 39th श्लोक में श्री कृष्ण को लेके ये लिखा है कि उन्होंने मथुरा में प्रवेश और कंस वध किशोरावस्था में किया था , और युवा अवस्था आने तक अनुमान लगा लो कितने वर्षों से गौपालन व्यापार चल रहा होगा और उसके बाद भी वे वहां मथुरा में including मथुरा के यादव लोग इतने वर्षों से गौपालन - दूध - दही का व्यापार ही किया करते थे यानी अनुमान लगा लीजिए मथुरा के यादव भी गो पालन सबंधी व्यापार ही सदा से नित्य किया कर रहे थे ये हरिवंश में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है । अर्थात् इसपर गहरा विचार मंथन करने के बाद क्या निष्कर्ष निकलता है ? क्षत्रिय मथुरा के यादव भी गोपालक थे । और गोप = अभीर = मथुरा के यादवों में कोई भेद नहीं था । सिर्फ इतिहास चोरों ने इसमें भेद दुष्प्रचार से फैलाया है। ( सबसे ठोस सबूत मै हरिवंश से आपको दे रहा हूं इसे कोई भी काट नहीं सकता कोई भी नहीं 🔥)

अब देखे आगे कितने सारे कृष्ण के यादव पूर्वज यहां वहां नगरों में बसे हुए थे ये सारे स्थलों पर अभीरो का निवास भी महाभारत में भरा पड़ा है यानी वे एक ही थे -



परशुराम जी का कृष्ण को दूध देना उनके ये दर्शाता है वो किस वेश में या उनका पसंदीदा पेय क्या रहा होगा

आगे देखे , ये कोई ताना नहीं मारा गया कि जरासंध ने कृष्ण को यादव के साथ ग्वाला लिखा । इसी प्रसंग में फिर जब युवा कृष्ण बलराम को जरासंध देखता है तो उनके ग्वाल वेश देखकर उन्हें तब कहता है वे दोनों ग्वाले है ये कोई ताना नहीं क्योंकि हमने अभी इसी प्रसंग में इन्हें गोप सिद्ध किया है ऊपर -


प्रसंग अनुकूलता के कारण ही यहां हमे मानना होगा इस सच को कि कृष्ण और यादव उस समय वास्तव में ही गोप थे । लोगो ने इन्हें क्षत्रिय कहकर गोपाल का खंडन करने में काफी दुष्प्रचार कर दिया है जबकि प्रसंग से ही जरासंध उन्हें गोप कह रहा है यही सत्य है !

अगर आपको अब भी संदेह हो रहा है तो उनके अपने वचन ही पढ़ लेवे -



हमे लगता है इतना ठोस प्रमाण देने के बाद तो कोई क्षत्रिय थे , गोप नहीं थे वाली बकवास नहीं करेंगे चलिए आगे बढ़ते है !

अब देखिए स्वयं भगवान श्री कृष्ण के पिता श्री वसुदेव जी महाराज स्वयं गोप थे , और मथुरा के यादव क्षत्रिय भी लीजिए महाभारत के खिल से प्रमाण -


अब यही same प्रसंग देवी भागवत महापुराण से भी वही देखे -



यदुवंशी = गोप का प्रमाण अब न कहना क्षत्रिय थे गोप नहीं थे और अब दूसरों के इतिहास की चोरी बंद कर देंगी चाहिए -


यही नहीं श्री कृष्ण को ब्रज त्यागने के पश्चात मथुरा में भी वासुदेव पुत्र "गोप" कहा गया है -





प्रश्न : कोई प्राचीन आचार्य है जिसे हिन्दू समाज नकार ही नहीं सकता उनका ऐसा कोई इंटरप्रिटेशन हो की महाराज यदु से ही ग्वालों का संबंध सिद्ध हो ऐसा कुछ है ?

उत्तर : वेदों के भाष्यकार सायन आचार्य से प्रामाणिक कौन होगा ? उन्हींका देते है। इससे पहले की इनका भाष्य हम दिखाए एक बात आपको ज्ञात होना ही चाहिए आचार्य सायण विजयनगर साम्राज्य जो कि यदुवंशियों का साम्राज्य था उसके प्रधान मंत्री थे । अर्थात् उस काल में राजा यदु को लेके क्या इतिहास प्रसिद्ध थी ये आचार्य सायण से बेहतर कौन ही जान सकता है और इससे हम ठोस रूप से ये सिद्ध कर देंगे की उस समय का प्रत्येक यादव राजा स्वयं को गौपालन से जोड़ता था क्षत्रिय होते हुए लीजिए वो प्रमाण -

ऋग्वेद 10/62/10 मंत्र पर सायन भाष्य

आप देख सकते आचार्य सायण भले ही वेदों में इतिहास निकाल रहे है परंतु उन्होंने यदु के साथ उन्हें "बहुगवादियुक्तौ" अर्थ किया अर्थात् बहुत सी गायों से सम्पन्न राजर्षि यदु जी वे गायों से घिरे हुए थे उन्होंने मनु के लिए पशु प्रदान किए । यहां ये बात विचारणीय है जो यादव लोग क्षत्रिय थे गोपालन से दूर रहते थे क्योंकि पूर्वपक्ष के अनुसार ये तो गोकुल के नंद बाबा से संबंधित थी न । और क्षत्रिय ग्वाला नहीं हो सकता फिर यादवों के प्रधान मंत्री सायन ने यदु और गो का कोई भी दूसरा अर्थ न लेकर सीधे सीधे ये संगति क्यों लगाई ? यदि यादव क्षत्रिय गोपालन कर ही नहीं सकते थे फिर ये बात उन्हें राजर्षि यदु कहते हुए कैसे संगति लगा दी। इससे मित्रों! ये निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया इतिहास में यादव वो ही है जो गोपालन से जुड़े हुए थे। ये १९१४ के बाद की परिकल्पना नहीं थी ! नहीं थी ! नहीं थी!

• अब हिन्दू ग्रन्थों में हम देखते हैं, श्री कृष्ण जहाँ एक रूप में योगेश्वर हैं तो वहीं दूसरे रूप में गोपेश्वर भी हैं! देखो — गर्ग संहिता : द्वारका खण्ड : अध्याय 12 में कृष्ण को अभीरों का पालक/रक्षक कहा गया है -




Some Basic level knowledge -

• संस्कृत के समस्त कोश इस चीज में एकमत है की ‘अभीर’ का अर्थ गोप ही होगा है -

1) चौथी शताब्दी ईसवी के संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अमरकोष’ में अभीर को वैश्य वर्ग में रखा गया है जिसका synonyms में गोप गोपाल आया हुआ है (इन्हें एक ही समझे यहां से आगे) -


2) शब्दकल्पद्रुमः कोश में अभीर का अर्थ -



3) वाचस्पत्यं शब्द कोष में अभीर का अर्थ - 



यहां जो शब्द सिद्धि की गई है हम देखते है -

‘अभीर’ शब्द में ईर् धातु है जो गतौ (जाने) की क्रिया अर्थ में प्रयोग होता है इसका ही कोषों में ‘ वर्तमाने लट ’ सूत्र अनुसार जाता है अर्थ बनेगा -


अब धातु के आगे "अभि" उपसर्ग पूर्वक पीछे आए ई से संधि होकर दीर्घ हो गया है जिससे ‘अभी’ ऐसा बन जाता है ।
ये ‘अभि’ उपसर्ग का अर्थ हमने देखा संस्कृत शब्दकोशों में अभिमुख अर्थ में प्रयोग हुआ है जो की सही है हम आपको यास्क आचार्य के निरुक्त से दिखा देते है -


अब संस्कृत व्याकरण में शब्दों के पूर्ण अर्थ प्राप्त करने हेतु कई नियम है जिसमें प्रसिद्ध लोकार्थ लिया जाता है वह ऐसे ‘गां गोष्ठम नयति ’ अर्थात् आगे - आगे चलते हुए गायों को गौशाला की ओर में ले जाता है ऐसे परिभाषा बनेगी।


प्रश्न : अब गोप, यादव, अभीर इन शब्दों का अर्थ क्या है ? 

उत्तर : यादव - राजा यदु के वंशजों के लिए शब्द है , बहुत लोग इसे भी जाति समझ लेते है लेकिन ऐसा नहीं है।

गोप - ग्वालों के लिए उपयोग किया गया संस्कृत शब्द। जैसे आप किसी को गायों का चराने वाला अथवा पालने वाला कहते है उसी को संस्कृत में गोप शब्द से लिखा गया है। बहुत जगह शास्त्रों में गोपकुल जैसे शब्द मिलते है , इसका अर्थ है ऐसा कुल जिसमें परंपरा से गोपालन का विशेष महत्व रहा हो। एक लगाव कह सकते है इसलिए ‘गोपकुल’ ।

अभीर - ग्वालों के लिए ही एक पर्यायवाची शब्द , 
जैसे मनुष्य - मानव, नर, मननशील प्राणी , मानुष इत्यादि 
राजा - नृप, भूप, महीपति, नरेंद्र, अधिपति इत्यादि 
ब्राह्मण - पंडित , विप्र, भूसुर इत्यादि योद्धा - वीर, शूर , क्षत्रिय , रणदुर्मद , रणधीर , संग्रामवीर इत्यादि 

ऐसे ही गोप शब्द के लिए ही अभीर शब्द एक पर्यायवाची शब्द है । आज ये कॉस्ट का फॉर्म ले चुकी है जिसका इतिहास हम आगे जानेंगे। 


• आभीर देश के साथ-साथ यदुवंशी गोपों के राष्ट्रों का संदर्भ भी हमें महाभारत में देखने को मिलता है (महाभारत काल से अभीर मूल निवासी) -

महाभारत (BORI CE), भीष्म पर्व, अध्याय 10 में संजय द्वारा भारतवर्ष के जनपदों का वर्णन किया गया है-





क्या श्री कृष्ण केवल ब्रज क्षेत्र में रहने से ग्वाले थे या फिर मरण पर्यंत गोप कहलाये ?


प्रश्न : क्या द्वारिका के यादव भी गोप गोपी ही थे ? 

उत्तर : हा बिल्कुल देखो इसमें महाभारत का प्रमाण -


यहाँ देवी सुभद्रा जी जब माता कुन्ती और द्रौपदी से प्रथम बार मिलती हैं, तब वे अपने पारम्परिक (सांस्कृतिक) ग्वालिन-वेश में ही उनसे भेंट करती हैं तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न उठता है कि यदि द्वारका के यादव ग्वाले नहीं होते, तो देवी सुभद्रा माता कुन्ती और द्रौपदी से मिलने के लिए ग्वालिन-वेश ही क्यों धारण करतीं?
क्योंकि देवी सुभद्रा कभी गोकुल में नन्द बाबा के पास रहने नहीं गईं, फिर भी महाभारत में वे ग्वालिन-वेश धारण करके ही माता कुन्ती और द्रौपदी से मिलती हैं। ऐसे में यह प्रश्न अवश्य उठता है कि यदि यादवों का गोप-ग्वाल परम्परा से कोई सम्बन्ध न होता, तो सुभद्रा द्वारा ग्वालिन-वेश धारण करने का कारण क्या था? फिर भी कुछ लोग निरन्तर यह कहते रहते हैं कि यादव, गोप और अहीर परस्पर सम्बन्धित नहीं थे, किन्तु इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर प्रायः नहीं देते। } 
अतः इस प्रसंग से भी यह सिद्ध होता है कि यादव-गोप-ग्वाल-अहीर एक ही थे। 🔥


प्रश्न: क्या गोकुल के नंद गोप यदुवंशी थे ?

उत्तर: हा बिल्कुल थे । देखो भागवत पुराण में नन्द और सुनन्द को प्रमुख सात्वतवंशीय व्यक्तियों में गिना गया है -


यादवश्रेष्ठ राजा सात्वत भगवान श्रीकृष्ण के पूर्वज थे। सात्वत से वृष्णि और वृष्णि से कृष्ण, इस प्रकार वंश परम्परा चलती है-


भागवत 10.34.4 की टीकाओं में सुनन्द जी को नन्द महाराज का कनिष्ठ भ्राता कहा गया है -


• भागवत पुराणकार लिखता है कि जब वसुदेव जी नन्द बाबा से मिलते हैं, तो वे उनसे "अनामय" शब्द से कुशल-क्षेम पूछते हुए देखे गए -

फिर देखे , यह शब्द मनुस्मृति 2.127 से आया है। जब भी किसी क्षत्रिय वर्ण के व्यक्ति से मिले, तो उससे "अनामय" शब्द से कुशल-क्षेम पूछा जाता है। यहां जिस नन्द बाबा को सर्व शास्त्रों में गोप कहा गया, उसे भागवतकार क्षत्रिय कह रहा है -


महाभारत देखने से हमे पता लगता है , अभीर जन बहुत ज्यादा शूरवीर थे जिनको कौरव सेना ने अपने पक्ष में युद्ध में सम्मिलित किया था यहां अभीरो के लिए शौर्य से संपन्न नरोत्तम यानी नरों में उत्तम राजाओं में गणना हुई है-



आप देखे वायु पुराण में अभीरो को क्षत्रिय कहा गया है -

वही महाभारत में एक जगह पंचनद के अभीरो को क्षत्रिय वर्ण का भी बताया गया है -



जबकि वराह पुराण में अभीर राजा को वैश्यकुल का कहा है -




इसी प्रकार ब्रह्मवैवर्त पुराण में अभीर को वैश्य वर्ण का बताया गया है । इसमें आप कृष्ण का नंद महाराज के प्रति भाव देख सकते है - पितु: पर: पिता त्वं च माता मातुः परापि वा॥
अर्थ: आप मेरे पिता वसुदेव से भी बढ़कर पिता हैं और मैय्या यशोदा ही मेरी माता देवकी से भी बढ़कर माता हैं।
जो श्री कृष्ण इस तरह नंद बाबा को मानते थे जिससे नेत्र से अश्रु निकल आवे । और आजकल कुछ लोग गोप वर्ग को गालिया देते रहते है नंद बाबा केवल पालने वाला पिता बोलकर उनका कोई अधिकार कृष्ण पर न था ऐसी बकवास फैलाते रहते है । देखे प्रमाण -  



भगवान् श्री कृष्ण का जीवन देखे — स्वयं कृष्ण जी अर्जुन के गुरु बने और उसे गीता का शाश्वत ज्ञान प्रदान किया , वही ब्राह्मण ग्रन्थों में आता है कि भगवान् कृष्ण से ही महर्षि वेदव्यास ने सामवेद प्राप्त किया था....
कृष्ण युद्ध भी करते हैं........
कृष्ण वैश्य की तरह गाय भी चरा रहे हैं, इस पर आगे प्रमाण देंगे, और कंस-वध पश्चात् मथुरा में दूध-दही के व्यापार करने लगे (स्रोत : हरिवंश पुराण : विष्णु पर्व : अध्याय 39 : श्लोक 39, गीता प्रेस)।
कृष्ण शूद्रों के धर्म अर्थात् सेवा-कार्य भी कर रहे हैं, दूसरों के पैर भी धो रहे हैं तथा सारथि बनकर सूत का धर्म, रथ हाँकना भी कर रहे थे!
(श्री कृष्ण के जीवन को देखें तो पता लगता है कि धर्म की कई जड़ बनी व्याख्याएँ श्री कृष्ण ने तोड़ीं व सही स्वरूप बतलाया।)
गोपों अभीरो के वर्ण को लेके भी कुछ ऐसा ही अस्पष्ट है । सभी जगह अलग अलग वर्ण दिए हुए है बाकी इसी कन्फ्यूजन का लाभ उठाकर विदेशी इतिहासकार इस लूप होल से इन्हें बाहरी बताने लगते है कि बाद में इन्हें शूद्र वैश्य से क्षत्रिय बना दिया गया होगा। इस तरह इतिहास के इतिकांड इनका चलता रहेगा । वास्तव में इनका वर्ण को कर्म आधार पर मानना ज्यादा ठीक है और अभीर / गोप कुल किसी महान पूर्वज का वर्ण मानना उचित है जिससे कि कुल चला इस प्रकार संज्ञा है। 


प्रश्न : क्या नंद गोप की पुत्री देवी एकानाम्शा / योगमाया जी और गोपकुल यादवकुल से ही थे ?

उत्तर : हरिवंश पुराण में श्री कृष्ण जी की बहन देवी एकनांशा / योगमाया को यदुकुल का बताया गया है -


ये प्राचीन प्रमाण हरिवंश पुराण का दिया गया है, जिसमें नंद गोप की धर्मपत्नी माता यशोदा जी के गर्भ से एकानंशा जी को जन्म लेने के लिए कहा गया है और वहाँ ‘गोपकुल’ और ‘यदुकुल’ का एक साथ ज़िक्र मिलता है।

देखिए शब्दकल्पद्रुमः कोश में यादवी का अर्थ दुर्गा किया गया है -


अब दुर्गा जी ने किस अवतार में वो यादव कहलाई तो इसमें महाभारत देखे -



अर्थात् जिस गोपकुल को गालिया जा रहा है आजकल सोशल मीडिया पर वो स्वयं यादव कुल है और माता दुर्गा का ही कुल है। देवी का अपमान भी हिंदू जाने अनजाने में कर रहा है ये स्थिति है हिंदुओं की । अब देखे वायु पुराण में भी देवी एकनांशा जी को स्पष्ट रूप में यादवी लिखा है -





अब देखिए मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गा सप्तशती में भी बताया गया है दुर्गा जी ने नंद गोप के ही कुल में अवतार लिया था और इस अवतार में विंध्यवासिनी माँ नाम से उनकी प्रसिद्ध भी हुई - 




अब हरिवंश पुराण में भी इनके लिए विंध्यवासिनी मां नाम से पुकारा गया है - 


इसके बाद लीजिए एकनांशा जी के मधुवंशी होने के प्रमाण भागवत पुराण से -


यही चीज मत्स्य पुराण में भी देखे -




अब देखिए एक जबरदस्त प्रमाण ,शक्ति संगम तंत्र सुंदरीखंड 7/35 श्लोक में आया है विंध्याचल पर अभीर देश हुआ करता था अर्थात् अभीरो का राज्य अभिरो की देवी मां विंध्यवासिनी इसका प्रमाण -

आभीरदेशो देवेशि विन्ध्यशैले व्यवस्थितः ।
अवंतीतः पूर्वभागे गोदावर्यास्तथोत्तरे ॥ ७-३५ ॥

अर्थ : आभीर देश = अहीर (आभीर) जाति का प्राचीन निवास क्षेत्र। यह विन्ध्य पर्वत के आसपास, मालवा (अवंती) के पूर्व और गोदावरी के उत्तर में स्थित था (आज के मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमावर्ती इलाके के आसपास)।

इससे यहां भी गोप = अभीर = मधुवंशी = यदुवंशी सिद्ध हुआ।


प्रश्न : क्या ब्रजवासी समस्त गोप भी यादव थे ? प्रमाणित करो।

उत्तर : हा बिल्कुल देखो इसमें प्रमाण -





अब देखिए अमर कोष 2.6.34 में भी सगोत्र (एक ही गोत्र का व्यक्ति), बान्धव (सगे संबंधी) , ज्ञाति (=कुटुम्बी, रिश्तेदार) , बन्धु , स्व , स्वजन ये अर्थ में दिया है यानि एक ही कुल -


इसलिए कहते है ब्रजवासी समस्त गोप / ग्वालवंशी = यदुवंशी कुल !

श्रीमान बलराम जी ने ब्रज के गोपों को श्रेष्ठ बांधव परिवार का कहा ।

और जो लोग ये कहते हैं कि नन्द बाबा को श्रीकृष्ण केवल पालने-पोषने वाले पिता-माता ही मानते थे तथा गोकुल छोड़ने के पश्चात द्वारिकाधीश नन्द बाबा और मैया यशोदा से कभी मिलने नहीं आए, तो हरिवंश पुराण देख लीजिए इस विषय पर-


प्रश्न : स्वजाति ऐसे ही मजाक में झूठ बोल दिया होगा तो ?
उत्तर : पढ़ो इसे -


• भागवत पुराण : स्कन्ध 10 : अध्याय 8 : श्लोक 12 में यदुवंश के कुलगुरु गर्गाचार्य बलराम जी का नामकरण-संस्कार करते वक्त कहते हैं कि इनका "संकर्षण" नाम इसलिए रखा जाएगा क्योंकि ये ही हमेशा के लिए यादवों और गोपों को एक कर देंगे और इनमें कोई भी अन्तर न कर सकेगा-

यह ऋषि गर्गाचार्य जैसे प्रमाणिक व्यक्ति का वचन है !

• भगवान श्री कृष्ण अभीर , नन्द अभीर का पुत्र स्पष्ट प्रमाण - 

गर्ग संहिता : विश्वजीत खंड : अध्याय ७ : श्लोक १४

• ब्रजवासी गोपों के लिए स्पष्ट रूप से "अभीर" शब्द -

श्रीनारायणीयम् दशमस्कंधपरिच्छेद : इंद्रयाग वर्णन

अब भगवत पुराण में शुकदेव जी कृष्ण और अन्य व्रज के ग्वालों को स्वजाति का कहते है अर्थात् जन्म से समान कुल/खानदान में उत्पन्न (कृष्ण = यादव = गोपकुल strong proof) :

गोप मित्रों के लिए ‘स्वजाति’ शब्द!

देखिए शब्दकल्पद्रुमः कोश में जाति शब्द का अर्थ -


अब संस्कृत के वाचस्पत्यं कोष में देखे जाति शब्द का अर्थ -



‘गोत्र’ शब्द के पर्यायवाची शब्द अमरकोष 2/7/1 में -

गोत्र = खानदान 

प्रश्न - क्या "अभीर" समुदाय को "शूद्र" कहना उचित है ? 

उत्तर - संस्कृत व्याकरण शास्त्र के महर्षि पतंजलि अपने महाभाष्य ग्रन्थ में पाणिनि १.२.७२ सूत्र के भाष्य में लिखते है 



इसमें पूर्वपक्ष की आपत्ति: यदि सामान्य-विशेष का द्वन्द्व नहीं होगा, तो "शूद्राभीरम्" शब्द कैसे कैसे सिद्ध होगा ? महाभारत आदि शास्त्रों में ये शब्द देखने को मिलता है , जब अभीर जाति शूद्रों (सामान्य वर्ग) का ही एक उपभेद (विशेष वर्ग) है , फिर कैसे यहां शब्द सिद्ध कर दिया इतिहास के ग्रंथों में ? यहां तो दोष आ रहा है पाणिनि के सूत्र में ।

इसपर महर्षि पतंजलि जी द्वारा इस गलत मत का खंडन : यहाँ "शूद्र" और "आभीर" में सामान्य-विशेष सम्बन्ध नहीं है, इसलिए "शूद्राभीरम्" द्वन्द्व रूप सिद्ध होता है। कोई भी दोष नहीं आएगा (नैष दोषः। आभीराः जात्यन्तराणि० ) क्योंकि अभीर तो शूद्र होते ही नहीं । वह शूद्रों से भिन्न/ अलग जाति समुदाय है इसलिए आराम से "शूद्राभीरम्" यह शब्द हो जाता है । 
{उपर दिए गए प्रमाण में देखे - महर्षि पतंजलि के इस तर्क पे ध्यान दिया जाए तो अभीर को शूद्र वर्ण में रखा ही नहीं जा सकता । और आजकल जो महाभारत इतिहास आदि ग्रंथों में "शुद्राभीर" ऐसे शब्द देखकर कहते है अभीर को शूद्र के साथ रख दिया इससे अभीर भी शूद्र कहा जा रहा है ऐसे अति मूढ़ जनों पर पातंजल महाभाष्य और व्याकरण के विद्यार्थी खूब हँसा करते है । क्योंकि इसी चीज का खंडन महाभाष्यकार करते रहते है शब्द सिद्ध करने में अन्यथा वह श्लोक जिसमें तुम्हे वो चीज दिखी वो सिद्ध ही नहीं हो पाएगा एक साथ रखने और ये तर्क मेरे नहीं ऋषि पतंजलि के है }

वही मनुस्मृति पशुपालन को वैश्य का धर्म बताता है न की शूद्र -


लेकिन वेदों में गायों का पालन तो सभी मनुष्य का कर्तव्य बताया है , गाय पूरे विश्व की माता है। इसलिए क्षत्रिय भी गाय पालन कर सकता है। देखो इसमें हैहय वंश के यादव कार्तवीर अर्जुन को भी गोपालक कहा गया है -


क्या इसमें भी कोई संदेह कर सकता है की वे क्षत्रिय यादव नहीं थे ?

प्रश्न: लेकिन अमर कोश ने जो अभिरी को महाशुद्री लिखा उसका क्या ?

उत्तर : इसी कारण आल्हा ऊदल की माता को नीच कहा जाता था इसी एक श्लोक के वजह से । लेकिन ये अप्रमाणिक है क्योंकि महर्षि पतंजलि के व्याकरण से ज्यादा प्रामाणिक ये नहीं जिसमें शूद्र होने का खंडन किया गया है और नहीं तो शब्द सिद्धि कैसे होगा ? इसलिए भी और अमर कोश के टीकाकारों ने इसे गोपालिका ही अर्थ किया है और एक ने तो सीधे वैश्य वर्ण का भेद लिखा है -



वेद - मनु स्मृति - व्याकरण शास्त्र के विरुद्ध होने से ये मान्य नहीं। जो अभीर होगा वह तबतक शूद्र नहीं कहला सकता , और जैसे ही शूद्र कहलाएगा वह अभीर नहीं रहेगा सिंपल है !  


प्रश्न : अभीर को मलेछ लिखा गया है उसका क्या ?

उत्तर : JSTOR जर्नल में प्रकाशित हुए एक रिसर्च के अनुसार शास्त्रों में जहाँ-जहाँ अभिरों के लिए म्लेच्छ शब्द का प्रयोग हुआ है, वह इनकी अपनी "अभीरी" नामक अपभ्रंश भाषा बोलने के कारण है, ये भाषा प्राकृत कोटि की नॉन-संस्कृत भाषा हुआ करती थी ये अनुमान हमे सही लगता है -




महाभाष्य (व्याकरण शास्त्र) में महर्षि पतंजलि अपने नवाह्निक में "म्लेच्छ" की परिभाषा करते हुए लिखते हैं, जो विकृत भाषा का उपयोग करता है, एक शब्द भी अशुद्ध उच्चारण से व्यक्ति "म्लेच्छ" कहा जा सकता है ! हम देखते हैं भारत में लगभग सभी non sanskrit भाषा ही बोलते हैं, तो उन पर भी ये टर्म बिल्कुल लगता है। पतंजलि का कहना है अशुद्ध व्याकरण को न समझे उच्चारण करना एक अति निंदनीय निकृष्ट कोटि में रखा गया है, वक्ता का नाश तक होने की बात कही गई। संभव है इसी लिए किरात, द्रविड़, पुलिंद और अभिरों को सख्ती से म्लेच्छ बोला गया, प्राकृत भाषा बोलने के कारण -


सम्राट अशोक के समकालीन लिखी सामवेद का उपवेद गंधर्व वेद में हमें भरत मुनि का नाट्यशास्त्र (300BCE) प्राप्त होता है, जिसके 17वें अध्याय में वो एक अभिरों की बोली जाने वाली भाषा का उल्लेख करते हैं अर्थात जिस काल में नाट्यशास्त्र रचा जा रहा था, उस काल में अभिर लोग अपनी अभीरी भाषा में बातें किया करते होंगे, जो बाकी संस्कृत भाषियों को संभव है समझ न आती हो ! इसीलिए उनको म्लेच्छ कहा गया हो सकता है, ये रिसर्च पेपर में भी अनुमान किया गया है -


हम देखते हैं, आज भी महाराष्ट्र में अनेक क्षेत्रों में मराठी के पैरेलल में "अहिराणी" भाषा का चलन देखने मिलता है। तथा राजस्थान-हरियाणा के इलाकों में हमें आभीरों की "अहिरवती" भाषा आज भी देखने को मिलती है। इसके साथ ही हम देखते हैं सम्राट अशोक ने भी अपने समस्त अभिलेख प्राकृत भाषा में ही लिखवाए हैं, क्या कारण रहा हो सकता है ?

• जो कहो इनकी समानता बाहरी म्लेच्छों से करनी है, फिर जो सभी शास्त्रों में अभिर शब्द का अर्थ गोप-गोपाल के समानार्थ में किया गया है, वहाँ संगति किस प्रकार लगाई जा सकती है ? अब क्या गौ का पालक भी सनातन धर्म में म्लेच्छ कहा जाएगा ? क्या गौ की रक्षा करने वाले म्लेच्छ संज्ञा के पात्र हैं ? फिर गाय काटकर खाने वाले किस संज्ञा से जाने जाएँगे, देवता, भगवान, वैदिक ? 

जिन अति बुद्धिमान लोगों को लगता है कि आभीरों के संदर्भ में बुरी बातें मिलावट कैसे मानी जा सकती हैं, वे मुझे इन श्लोकों का अर्थ और वास्तविकता समझा दें-

(महाभारत आदि पर्व चैत्ररथ पर्व १७४वाँ अध्याय)

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अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वोलक्षितो महत् ॥३५॥  
असृजत् पल्लवान् पुच्छान् प्रस्रवाद् द्रविडाञ्छकान् ।  
योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ॥३६॥  

गायके शरीरसे अपूर्व दीप्ति प्रकट हो रही थी । वह दोपहरसे सूर्यकी भाँति उद्भासित हो उठी । उसने अपनी पूँछसे बारंबार अङ्गारकी भारी वर्षा करते हुए पूँछसे ही पल्लवोंकी उत्पत्ति की, थनों से द्रविड़ों और शकों को उत्पन्न किया, योनिदेशसे "यवनों" और गोबरसे बहुतेरे शबरोंको जन्म दिया ॥ ३५-३६ ॥

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मृत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः ।  
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलांश्च बर्बरान् खसान्  

कितने ही शबर उसके मूत्रसे प्रकट हुए । उसके पार्श्व-भागसे पौण्ड्र, किरात, यवन, सिंहल, बर्बर और खसों की सृष्टि हुई ॥ ३७ ॥

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चिबुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान्।
ससरज फेनत: सा गौर् म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥३८॥  

इसी प्रकार उस गौने फेनसे चिबुक, पुलिन्द, "चीन"(Chinese) , हूण, केरल (kerala peoples) आदि बहुत प्रकारके म्लेच्छों (Mlechhas) की सृष्टि की ॥३८॥

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तैर्विसृष्टैर्महासैन्यैर्नानाम्लेच्छगणैस्तदा ।  
नानावरणसंच्छन्नैर्नानायुधधरैस्तथा ॥३९॥    

उसके द्वारा रचे गये नाना प्रकारके म्लेच्छ गणोंकी वे विशाल सेनाएँ जो अनेक प्रकारके कवच आदिसे आच्छादित है॥३९॥ 


वाल्मीकि रामायण बाल-काण्ड के पचपनवें सर्ग में भी देखें---

कि यवन गाय की यौनि से उत्पन्न होते हैं और गोबर से शक उत्पन्न हुए थे ।

योनिदेशाच्च यवना: शकृतदेशाच्छका: स्मृता।   
 रोमकूपेषु म्लेच्‍छाश्च हरीता सकिरातका:।3।

यौनि देश से यवन शकृत् देश यानि( गोबर के स्थान) से शक उत्पन्न हुए रोम कूपों म्लेच्‍छ, हरित ,और किरात उत्पन्न हुए।3।।

बाकी, भगवान इन आक्षेपकर्ताओं को सद्बुद्धि दें, यही कामना है! 

प्रश्न : देखो अहीरों (ग्वालों) को शास्त्रों में कितना खराब बताया गया है मनु स्मृति उन्हें वर्ण संकर कहती है अन्य शास्त्र उन्हें नीच शूद्र म्लेच्छ भी कहते है । अब श्री कृष्ण तो क्षत्रिय थे यादव थे भगवान थे उनको भी अहीर/ग्वाला कह दोगे फिर उन्हें भी वर्ण संकर नीच शूद्र कैसे मान सकते है ? 

उत्तर : राजा ययाति क्षत्रिय थे , उनकी पत्नी ब्राह्मणी थी जिनसे महाराज यदु उत्पन्न हुए क्या महाराज यदु को भी वर्ण संकर कहोगे और उन्हें वंशज श्री कृष्ण को भी ? और जो अभीरो के वर्ण संकर की श्लोक दिखा रहे हो ये अन्य ग्रंथों में अलग अलग वर्णों के मेल से बताया है कोई सटीक परिभाषा नहीं दे रहा इसलिए ये प्रक्षिप्त है जो इसे प्रामाणिक ही मानते हो तो पहले इसे समझो , मनु स्मृति स्वयं चिकित्सक और वैद्यों को वर्ण संकर कैटेगरी में रखती है , मनुस्मृति 10/47 -


मनुस्मृति 4/220 -

महाभारत शांतिपर्व अध्याय 36 / श्लोक 29-30 -


ऐसा ही महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 90 / श्लोक 13-14 में आया है ।

अपस्तंब धर्मसूत्र प्रथम प्रश्न : षष्ठ पटल: कंडिका १९ : श्लोक १४ -

गौतम धर्मसूत्र 2/8/17 -


ऐसे ही अपस्तंब धर्मसूत्र प्रथम प्रश्न : षष्ठ पटल: कंडिका १८ : श्लोक २१ में भी है और फिर अत्री स्मृति 385 श्लोक में तो वैद्य के लिए कहा गया है की आयुर्वेद पढ़ने वाला वैद्य , अगर देवगुरु बृहस्पति समान बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए , तब भी पूजनीय नहीं । यहां वैद्य चिकित्सा कर्म को तो नीच ही माना जा रहा यहां इन समस्त श्लोकों में । हम तो आयुर्वेद की महिमा गाते नहीं थकते थे अब कैसे चलेगा इनको ही शास्त्रों में अधम नीच मान लिया गया। ऋषि सुश्रुत ऋषि चरक आचार्य वागभट्ट भगवान धन्वन्तरि आदि कितने ही महान वैज्ञानिक डाक्टर वैद्य (हर रोगो को ठीक करने वाला) है , जिसे father of surgery प्रचार करते रहे हो उन्हें तो वर्ण संकर लिख रखा है यहां आर्ष ग्रंथों में । ये निम्न शब्द ऋषियों भगवानो के साथ जोड़कर उनका दर्जा क्योंकर गिराया जाए अब ? जैसे योगेश्वर कृष्ण के साथ गोप अभीर गोपाल नाम आप नहीं देख पा रहे थे फिर यहां वर्ण संकर पेशे को लेके किसी ऋषि के साथ क्यों जोड़ रहे है ? ये सारे वर्ण संकर के नियम प्रक्षिप्त मानना चाहिए नहीं तो कल से आयुर्वेद से अपना धो लेना।

और मनु के काल में वर्ण संकर की परिभाषा कुछ भी रही हो महाभारत काल के पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर कहते है - उनके काल में जितने भी मनुष्य थे सभी वर्ण संकर हो चुके थे । यहां युधिष्ठिर ने हर किसी को लपेट दिया लेओ ! जो जो स्वयंको मनुष्य कहते है उन सबको वर्णसंकर बोल दिया तो ये वाला टॉपिक ओवर आर्ष ग्रंथ से - 













अभिरपल्ली












प्रश्न : द्वारिका की अपराजेय नारायणी सेना कौन थी ?

उत्तर : द्वारिका की नारायणी सेना गोकुल(ब्रजक्षेत्र) के यदुवंशी गोपाल गण ही थे , जिन्हें अभीर भी कहा जाता है।  














यहां अभीरो का जोड़ना है अच्छे से महाभारत का भी दुर्गा का प्रमाण सब देना ।


भगवान श्री कृष्ण जी को स्पष्ट रूप से अभीर कहा आया है ?

पद्म पुराण वगैरा यहां देना और प्राचीन भी जैन आदि के सारे दे देना इधर 

तुलसीदास सूरदास का दे देना main main और भी राजपूत का मीराबाई आदि का देना जरूरी है एकदम राजस्थान का और श्री नारायणीयम का
कहना एकदम हाईलाइट कलर से की हम ये कह सकते है राजस्थान के सारे शीर्ष विद्वान गण १९वि शताब्दी तक अंग्रेजों के आने से पहले सब कोई मानता था कृष्ण जी अहीर थे । ये एकदम क्लियर कर देना 

ये हाल फिलहाल में इतिहास चोरों ने अपना घर का बनाया हुआ नया मत चला दिया है कि अहीरों ने 1914 के बाद यदुवंशी स्वयं को कहा उससे पहले इस पक्ष में कोई प्रमाण नहीं। ये प्राचीन प्रमाण इनके झूठे दावों का पर्दाफाश करती है और आगे भी सदा करती रहेंगी। 


• सबसे main विषय महाभारत : मौसल पर्व के अभीरो द्वारा गांडीवधारी अर्जुन की पिटाई - 

उत्तर : देखो , पहले ये देखो पंचनद देश गौ से समृद्ध देश था वहां बहुलता से अभीर रहते थे, उन्हीं का देश था। पहले ये प्रमाण लो कि वो अभीर लुटेरे स्वयं "गोपाल" थे -




















विष्णु पुराण में इन्हीं पंचनद के लट्ठधारी अभीरो को गोप लिखा है देखे प्रमाण -







प्रश्न : तुलसीदास ने और भागवत पुराण ने अभीराे को पाप यौनि बताया है इसलिए वो यदुवंशी कैसे हो सकते है ?

उत्तर : देखो तुलसीदास ने निर्मल मन की तुलना अहीरों से की है । यहां अहीरों को निर्मल शुद्ध स्वच्छ कहा गया है -




और गर्ग संहिता में इन्हें उच्च जाति लिखा है (मै उच्च नीच भेद भाव हेतु ये प्रमाण नहीं दे रहा , परंतु जब कोई अहीर समुदाय को श्लोक दिखाकर नीच कहता है उनके डिफेंस हेतु उन्हीं ग्रंथों से ये प्रमाण भी दिखाता हु) -

गर्ग संहिता : वृंदावन खंड : अध्याय 18

हरिवंश में नंद गोप को आर्य शब्द से संबोधन हुआ है और गोप लोग इंद्र यज्ञ और गिरी यज्ञ भी किया करते थे इससे वे नीच अथवा पापी नहीं कहला सकते और ये कर्म फल व्यवस्था को violate करता है यदि किसी को जन्म से ही पाप यौनि कह दिया जाए तो कर्मफल pre - decide है , गीता तो ये नहीं कहती -



• अभीर गोप ही होते है , जहां अभीरो को उल्टा सीधा लिखा वही बात ब्रज के पवित्र स्थली गोपों को भी तो लिखा है ! अब न कहना भगवान श्री कृष्ण के साथ वाले ब्रज के गोप और बाकी अभीरो में कोई लेश मात्र भी अंतर है एकदम स्पष्ट प्रमाण देता हु ब्रज गोप का -






अब देखो गोपों को क्या लिखा है व्यास स्मृति में -







अब देखो ब्रह्मवैवर्त पुराण में क्या लिखा है -


देखो इन लोगों ने नीच शूद्र पापयौनि इसलिए लिखा क्योंकि गोपालन वृत्ति को मध्यकाल के ब्राह्मण नीच कार्य समझते थे क्योंकि अभीर का अर्थ ही गोप होता है दूसरा इन्हें भगवान श्री कृष्ण की पूजनीयता सिद्ध करनी थी इसलिए अभीरो को निम्न दिखाया है । एक को निम्न दिखाओ तो दूसरे की पूजनीयता अपने आप सिद्ध होती है मध्यकालीन ब्राह्मणों की यह कॉमन सी तरीका है। अब देखो गोप को भी तो वही चीज़ लिख रखी है जब मैने इन्हें यदुवंशी सिद्ध कर दिया है फिर कोई क्या लिखता है इससे उसके वंश का क्या लेना देना ? इसे प्रक्षिप्त भी तो मान सकते है प्रमाण से परस्पर विरुद्ध जाने से । 


प्रश्न: यादव तो गांधारी के श्राप से द्वारिका में आपसमें ही लड़कर मारे गए फिर आज इतने सारे यादव कैसे हुए ?

उत्तर - ये कुतर्क बड़ा फेमस है मित्रों ! परंतु विद्या रहित लोगो में ही प्रसिद्ध है क्योंकि यदि हरिवंश आदि अन्य शास्त्र को ये लोग पढ़ लेते तो ऐसी बाते कदापि नहीं करते । सर्वप्रथम यादव वंश बहुत विशाल है जिसमें केवल क्रोष्टु के वंश में श्री कृष्ण और उनके यादव गिने गए है , परंतु क्रोष्टु से अतिरिक्त भी राजा यदु के वंशज थे जो आर्यावर्त में अनेक राज्यों पे राज करते थे अर्थात्  यदि मान भी लेवे की द्वारिका में कृष्ण जी का वंश नष्ट हो गया होता तब भी हजारों करोड़ की संख्या में यदुवंशी बच ही जाते सबसे पहले नंद बाबा के राज्य में यदुवंशी बचते , 
और हरिवंश पुराण में स्पष्ट लिखा हुआ है श्री कृष्ण के पूर्वज यादव सहयाद्रि सौराष्ट्र महाराष्ट्र आंध्र साउथ , और ब्रज क्षेत्र में भी हुआ करते थे वे सभी बच गए थे इसके प्रमाण देने से पूर्व ये देखे स्वयं महाभारत कहता है द्वारिका के ही यादव पुरुष वृद्ध बालक कितने सारे बच गए थे और श्री कृष्ण के वंशज वज्र को अर्जुन ने राज सिंहासन पे बिठाया था (समस्त क्षत्रिय यादवों के अंत के बाद) इस प्रमाणसे गांधारी का श्राप ही असिद्ध होता है श्राप लगेगा भी क्यों ? जब यादव और भगवान श्री कृष्ण निर्दोष थे  - 


अब देखो विष्णु पुराण में भी ये ही लिखा है -


अब हम आपको इस यादव वज्र के भी आगे का इतिहास दिखाते है हरिवंश से देखे -


अब देखिए विष्णु पुराण से (क्या यादवों की संख्या लिखी है इसमें पढ़ लीजिए एक बार) -


अब भागवत पुराण से देखिए -


अब स्कन्द पुराण से देखिए आगे यादव राजा श्री वज्र क्या करते है (ये जानकारी आपको कोई भी नहीं बताएगा) -  




इसमें क्या लिखा है ? द्वारिका के बचे हुए सारे यादव तथा ब्रज के गोप यादव पुनः मथुरा में जाकर बस गए जिसपर यादव वज्र शासन करते थे अर्थात् जो कहते है यादव केवल एक ही स्थान पे बचे और वही के लोग original descendent है ये दावा फर्जी सिद्ध हुआ । श्री कृष्ण जी के वास्तविक descendent हमेशा से मथुरा के क्षेत्र में ही रहा है और वही के लोग होंगे भी। ये मेरा निष्कर्ष है।



अब आगे , किसी एक व्यक्ति ने अभिरो के साथ सबसे ज्यादा अन्याय किया है जिसकी कोई क्षमा नहीं है तो अगर हमे एक व्यक्ति का नाम लेना हो तो वह व्यक्ति होगा - अलेक्जेंडर कनिंघम। इतिहास में ये बहुत weak थे , आज जितना झगड़ा फैला है सारा इनका ही कियाधरा इन्होंने अपनी शोध में करौली के यादवों को यदु का एकमात्र डिस्क्सेंडेंट कह दिया । ये कन्क्लूजन उन्होंने तब दिया था जब इनको राजस्थान से एक शिलालेख प्राप्त हुआ उसी पर अज्ञान से गपोड थ्योरी दे दी और कुछ कपटपूर्ण षडयंत्र भी रच डाला । इनका ही कहना था यादव आज बहुत कम बचे है और जो original है वे करौली के सिंहासन पर ही आसीन है। आप विचार कीजिए पाठकों! हमने अपने पिछले प्रथम लेख में १० साम्राज्यों के शिलालेख दिखाये और ऐसे तो कितने ही शिलालेख है जिसमें ऐसी न जाने कितनी बाते लिखी मिल जाएंगी। लेकिन अंग्रेजी शासन काल में अलेक्जेंडर कनिंघम ने वो अन्याय पूर्ण निष्कर्ष दिया जैसे आगे आनेवाली पीढ़ियां इनकी झूठ पकड़ ही न सकेगी। हमने इनके जो हेतु दिये है वही पिछले पोस्ट में लगभग १० साम्राज्यों में सिद्ध के दिया । अब अंग्रेज तो चले गए कुछ काले अंग्रेज हमारे ही भाई यहां मौजूद है जो आपस में लड़ रहे है और प्रमाण वो आज भी उस अलेक्जेंडर कनिंघम और उसके चेलो का देते है। 

अब मैं थोड़ा कनिंघम साहब की इस विषय पर इनकी विद्वत्ता दिखाता हु इनका टेस्ट भी तो लिया जाए -



इन्होंने इन दो पृष्ठों पर लिखा है कि ह्वेन त्सांग ने अपने यात्रा वृतांत में मथुरा राज्य के सिंहासन पर एक शूद्र राजा को देखा । आप सोचिए , यादवों के इतिहास पर इतना बड़ा निष्कर्ष देने वाले कनिंघम साहब कैसे स्वाध्याय करते थे और कितने बड़े रिसर्चर थे । पूरी ह्वेन त्सांग की यात्रा वृतांत में मथुरा में ऐसा कोई संदर्भ लिखा हुआ ही नहीं है और इन्होंने वहां काल्पनिक कहानी गढ़ डाली। अंग्रेजों के बताए इतिहास पर कौन ही विद्वान भरोसा करे जहां इतिहास का इतिकांड बनने में देर नहीं लगती!

आक्षेप - अभीर विदेशी जनजाति थी !

लन्दन से छपी R V russel की किताब "ट्राइब्स एंड कॉस्ट ऑफ सेंट्रल प्रोविन्सेस ऑफ इंडिया" में अभीरो को बाहर से भारत में आए, ऐसा बताया गया है जिसको दिखाकर अनेक विधर्मी आज कल यदुवंशी अहीरों को भ्रमित करते रहते है । रसल का ये भी कहना है की अभीर लोगो का ग्वाल रूप में परिवर्तन, ये भी बहुत बाद में हुआ है । अभीर जनजाति विदेशी थी जो आर्यों के पश्चात भारत में आई और आगे चलकर खुद को गौपालन के व्यवसाय से जोड़ लेती है । हरिवंश और भागवत पुराण में इनका कोई प्रमाण उसे गोप यदुवंशियों से जुड़ा हुआ प्राप्त नहीं हुआ —




उत्तर - ये तो वही बात हो गई कि 



इन महाशय की विद्वत्ता को २१ तोपों की सलामी देनी तो बनती ही है , क्या ही शोध करते थे ये अंग्रेज मानना ही पड़ेगा ! ये कह रहे है अभीरो का गौ पालन से ही कुछ लेना देना नहीं था । मतलब इसपर क्या प्रतिक्रिया दूँ ? हम सब समझ रहे है क्यों हर बार किसी प्राचीन चीज को ले देकर christian era के आस पास फिट करने वाली थ्योरी अंग्रेज देते है । ऐसे छल कपट युक्त प्रचार करके इन्हें क्या मिलता है जब प्रमाण सर्वत्र चीख - चीखकर कह रहे है "अभीर" का अर्थ गोप होता है । इस शब्द की सिद्धि में हम पूर्व ही देख आए है। इन्होंने सारी ज्ञान की गंगा पांच सौ पन्ने में लिख मारे है लेकिन अभीर शब्द संस्कृत में कैसे सिद्ध होता है ये न बताकर ये महाशय बड़ा खुश हो रहा है और धन्य है वे भारतीय इतिहासकार भी जो इसे भी तालिया बजाते हुए स्वीकार कर लेते है । जिस देश में ऐसे लोगों के हाथों संस्कृत का रिसर्च हो, उस देश के इतिहास का यदि बेड़ा गर्क हो भी जाए तो किसे आश्चर्य हो। मुझे लगता है अब से महर्षि पाणिनि आदि को संस्कृत व्याकरण का ऋषि न मानकर इन अंग्रेजों और भारतीय पाश्चात्य प्रेमी इतिहास कारो को ही व्याकरण के एकमात्र ऋषि मानना पड़ेगा क्योंकि इनकी शब्द सिद्धि नेक्स्ट लेवल की होती है । ये नहीं देखते संस्कृत में शब्द किस अर्थ में बन रहा है या व्युत्पन्न हो रहा है ये उसे भूल जाते है और फिर सीधे ऐसी थ्योरी देते है जिससे पहले व्याकरण को ही आत्मा हत्या कर लेनी पड़े । मुझे तो बस हंसी ही आ रही है इन लोगों की शोध पढ़कर । इन महाविद्वानों को दूर से ही नमन है जिन्हें संस्कृत की प्रारंभिक कक्षा का ही ज्ञान न हो । आगे इनका दुनिया पलटने वाला तर्क सुनिये - ब्रज क्षेत्र के प्रसंगों में अभीर शब्द नहीं मिला इसलिए अभीर और गोप अलग होते है उनका गौ पालन से संबंध बहुत बाद में जोड़ा गया, इस कुतर्क के लिये इन्हें दस बारह नोबेल पुरस्कार तो भिजवा ही देना चाहिए । मतलब इसी तरह इन लोगों ने भगवान श्री कृष्ण के दो नाम वासुदेव और कृष्ण में भेद दिखाया था । कहा कि लगभग २००० वर्ष से पहले कृष्ण का सिर्फ़ वासुदेव ही उनका वास्तविक नाम था , और बाद में जाकर कृष्ण नाम उस कैरेक्टर से लोगो ने जोड़ा दिया। आपको सुनकर आश्चर्य होगा इस मत को भी भारतीय इतिहासकारों ने स्वीकार कर लिया है। ये दोनों अपने ही में प्रमाण - प्रमाण देते रहते है इनको कौन मानता है भारत में ? एक भेड़ के पीछे दूसरा भेड़ चल रहा है और फिर दूसरा भेड़ के पीछे तीसरा । इनको मै कहता हूं एक अलग ही महाभारत बना लो भाई ! और उसकी कथा भी किया करो, क्योंकि ये सारे चीजें आपस में ही खेलने के लिए बनाए गए है , भारतीय परंपरा में इसे कौन ही मानता है ? माने भी क्यों जब सबसे बेसिक का ही ज्ञान इन्हें न हो। मित्रों, जिस व्यक्ति को अपत्य अर्थ में संस्कृत में नाम कैसे बनते है इसकी बेसिक ज्ञान न हो केवल वही ऐसी बाते कर सकते है , जिन्हें ज्ञान नहीं होता वे भी इतिहास और संस्कृत पर बाते करते है ये तो भारत के लिए अच्छा नहीं , इतना लेवल डाउन हो तो उन्हें क्यों अधिकार प्राप्त है इतिहास पे कुछ भी लिखने का। जब हर व्यक्ति के कोई माता पिता वा पूर्वज होते है , संस्कृत साहित्यों में उस नाम से भी संतानों को जाना जाता है ,उससे एक नाम संस्कृत में बनता ही है । इन नामों में कोई अंतर या पहला बाद का मानना अविद्वानों का ही कथन है।

आगे जैसे मेगस्थनीज अपनी इंडिका लिखता है भारत में कोई सांद्रकोटस नाम का राजा राज्य करता था । उसका चंद्रगुप्त से कोई भी लेना देना नहीं क्योंकि चंद्रगुप्त नाम तो उसने कही लिखा नहीं । फिर भारत में सम्राट अशोक को देवनाम प्रियदर्शी लिखा है अर्थात् देवताओं के प्रिय अशोक इस हिसाब से अशोक भी देवपुत्र था न की चंद्रगुप्त का पुत्र । और देखो , मजे की बात है अशोक ने अपने किसी भी अभिलेख पर एक जगह भी चंद्रगुप्त नाम नहीं लिखा , अब अंग्रेज लिखेंगे चंद्रगुप्त तो अशोक के पिता बाद में बन दिए गए । अशोक के अभिलेखों में अशोक शब्द भी कुछ एक स्थानों पर ही मिले , यानी अब ये कहेंगे अशोक नाम अप्रचलित था बाद में हम लोगों ने इसे बढ़ा चढ़ाकर प्रसिद्ध कर दिया ।

आगे और देखे , अशोक के शिलालेखों में कही भी गौतम बुद्ध शब्द नहीं मिला , यानी ‘गौतम बुद्ध’ नाम बहुत बाद का है ।
वही अशोक ने बुद्ध को सिद्धार्थ गौतम भी नहीं लिखा इसलिए सिद्धार्थ गौतम भी बहुत बाद में लोगो ने जोड़ दिया बुद्ध के साथ । अभिलेखों में शाक्यमुनि शब्द प्राप्त होता है इसलिए शाक्यमुनि ही बुद्ध का प्राचीन एवं वास्तविक नाम था सिद्धार्थ गौतम को बाद में बाहर से आए लोगो ने (जो आज इस नाम से इतिहास मानते है) अपनी मान्यता को बुद्ध के साथ merge कर दिया । आप कह रहे होंगे ऐसे तो इतिहास का इतिकांड हो जाएगा कैसे माने ये सब ? हा तो ऐसे ही हमारे इतिहास कार शोध करते है , आपको ये भी मानना पड़ेगा और भारत का पूरा इतिहास इसी तरह नया लिखना पड़ेगा सभी को बाहर से आया हुआ मानकर । 

जब महाभारत ग्रन्थ में वेदव्यास द्वारा आभीरो के जनपद को आर्यावर्त के अंतर्गत ही लिखा जा चुका है तथा महाभारत युद्ध में भी शूरवीर अभीरो के भाग लेने की बात हुई है फिर उन्हें महाभारत बाद का बताकर मनमानी कोई क्यों ही करना चाहेगा ? अंग्रेजों की किताब जब भी मै खोलता हूं तो सर्वप्रथम एक बात मेरे मस्तिष्क में आ ही जाती है , जब प्रमाण स्वयं प्रकट हुई सामने खड़ी हो और कहे मै तुम्हारे समक्ष हु , तब भी विरुद्ध जाकर hypothesis देकर अपने घरकी बाते जहां लिखी मिलेगी यही शोध अंग्रेजों का होगा ये इनके पुस्तकों का एक लक्षण है । क्योंकि अंग्रेजों ने अपने सारे पुस्तकों में इसीप्रकार अधकचरा (=कूड़ा) ज्ञान भरा हुआ है। वे ये तो चाहते है की कोई उनकी मूर्खता का सुधार करे परंतु वे स्वयं ठीक ढंग से अध्ययन नहीं करते फर्जी क्लेम करने से बाज़ भी नहीं आते और सदा भ्रम फैलाने में भी अव्वल रहते है । इनको भारत में प्रत्येक समुदायको विदेशों से ही इंपोर्ट करवाना रहता है । खैर , आगे बढ़ते है 
लीजिए महाभारत के अंतःसाक्ष्यों से प्रमाण - 




महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य के गरुड़ व्यूह में शूरवीर क्षत्रिय अभीरो का वर्णन –




एक और प्रमाण में हमे पितामह भीष्म के बनाए गरुड़ व्यूह में ग्रीवा भाग में स्थित पंचनद प्रदेश के योद्धाओं का जिक्र मिलता है -


Hajakdkskak

उन पंचनद के अभीरो को महाभारत युद्ध में "क्षत्रिय" कहा गया, रसलको लगा होगा मौसल पर्व में इन्हें दस्यु लिख दिया इसलिए ये वैदिक धर्मी नहीं बाहर के रहे होंगे अब क्षत्रिय वर्ण का बताये जाने पर क्या इन्हें बाहरी कहा जा सकता है -




रसल का कहना था कि अभिरो के साथ गोपालन का व्यवसाय बहुत बाद में जोड़ा गया , ये कैसी बेइमानी से युक्त या स्वाध्याय में किए लापरवाही का अंजाम है । अब आपको महाभारत काल से ही हम दिखाते है आभीर जन गोपालक ही हुआ करते थे। 

महाभारत में राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में आए आभीर देश से आए आभीरो ने ढेर सारे गाय भेट में दिए, ये कोई बाद में चुना गया इनका व्यवसाय नहीं था ,



आगे जिस मौसल पर्व के अभीरो को सर्वत्र कोट करा जाता है वह भी गोपालक समुदाय से ही थे देखे ,




अब विचार कीजिए जो पंचनद देश को गौ से समृद्ध बताना फिर आभीरो का जिक्र उनके हाथों में लाठी होना जिससे वे एक धनुषधारी पर प्रहार कर रहे थे । अवश्य वे गोपालक ही थे । अर्थात् इनमें बाद में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है रसल ने बस फर्जी दावे किए थे । हम यहाँ इन प्रमाणों से यही स्थापित करना चाहते है की आपको ये सत्य स्वीकारना ही पड़ेगा की अभीर गोप का ही पर्यायवाची संस्कृत शब्द है जो प्रायः एक अर्थ में प्रयोग होता रहा है। ये दोनों शब्द संस्कृत भाषा में जिस रूप में प्रयोग होते है उन्हें उसी रूप में न देखकर संस्कृत की ऐसी - तेसी अंग्रेजों ने कर स्वयं की तो जगहसाई करवाई ही , पर आप क्यों ये मूर्खो में शामिल होना चाहते है ? 

प्रश्न : अभीरो ने वृष्णि कुल के स्त्रियों को क्यों हरण किया ?

उत्तर :












रसल ने अपने लेख में ये बात भी लिखी , हरिवंश में अभीरो को "गोपालक" नहीं बताया गया और उसने वहां अभीर - गोप को अलग करने की चाल चली (अर्थात् सारे भारतीय आचार्यों की परंपरा झूठी , और रसल का दावा सच्चा ) अब देखो हरिवंश से ही -






रसल ने भागवत पुराण का भी जिक्र किया , की इसमें भी अभिरो को कही गोप नहीं कहा गया । बड़ी ही हास्यास्प्रद बात है ये तो क्योंकि भागवत पुराण में अर्जुन को पंचनद(पंजाब) के अहीरों ने ही मारा पीटा लूटा था उसे उसमें सर्वत्र गोप ही लिखा है , इससे सिद्ध हुआ रसल ने भागवत पुराण या अन्य कोई भी शास्त्र कभी खोला भी न था -


(आज भी पंजाब राज्य में "अहीर यादव सिखों" की आबादी रहा करती है जिनके पूर्वजों में से किसी ने कभी गांडीवधारी अर्जुन को पीटा था )

यही नहीं , विष्णु पुराण में भी अभीरो के साथ साथ गोप शब्द स्पष्ट एक साथ लिखा हुआ है , अब क्या कहोगे ? गोपों ने ही तो अर्जुन को लूटकर वृष्णि स्त्रियों को हरण किया था । फिर इनमें भेद दिखाने वाले कितने पढ़े लिखे है ये समझा जा सकता है -


अब बोलोगे महाभारत में अभीर जो थे वे वही नारायणी सेना के गोप नहीं थे ? यहां मित्रों ! इनकी बोलती बंद कर देने वाला कई प्रमाण हमने दे दिया है , अभीर ही वास्तविक यदुवंशी गोप थे भले वो ब्रज क्षेत्र में रहे या कही और , लेकिन गोप तो अभीर ही होता है और अभीर ही गोप । महाभारत युद्ध में नारायणी सेना वास्तव में अभीर गोप ही थी, इसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं । 

इसके आगे देखे , पंचनद (पंजाब + हरियाणा - हम जब भी पंचनद या पंजाब लिखे, तो ये दोनों राज्य ही लिया करे क्योंकि सन् १९६६ में ये अलग अलग हुए महाभारत काल में एक ही थे ) को गायो से बहुल राज्य बताया है यानी स्पष्ट है वहां गोपालक रहा करते होंगे और प्रमाणों में वहां आभीरो को बसा हुआ बताया गया है । यानी अहीर ग्वाला ही था शुरू से । साथ ही सरस्वती किनारे राज्य के अभीरो को महाबली क्षत्रिय कहा गया , वर्ण व्यवस्था में इन्हें शूरवीर क्षत्रिय माना जाता था (बाहरी नहीं) -







अब रसल जैसे अज्ञानी शोधकर्ताओं के लिए हम 300 BCE का प्रमाण देते है , इनका दावा था कि अभीर लोगों को कृष्ण से संबंधित "गोप" ५वि सदी में बना दिया गया था ऐसे इतिहास का इतिकांड करने वाले सभी देखे प्रमाण -





















कुछ लोग ये भी कहते है पंचनद में कुछ अहीरों ने अर्जुन को मारा पीटा लूटा तो वहां सिर्फ दस्यु लुटेरों का ही वास था, अच्छे पुण्यकर्मा आभीर लोग नहीं रहते होंगे , वे कर्ण के निंदात्मक श्लोक भी इस पक्ष में दिखाते है । एक घटना से पूरा राज्य ही दुष्टों का था इसप्रकार की बाते किया करते है । परन्तु ये बात सही नहीं है उस देश में अच्छे अभीरो की भी भरमार थी जिनके कारण पंचनद (पंजाब) "तीर्थ कोटि" में शामिल हो गया देखे प्रमाण -















इसलिए कुछ गलत लोगों के कारण पूरे समाज को उसी तरह generalize नहीं करना चाहिए । अच्छे बुरे लोग सभी समाज में रहते है । 



प्रश्न : क्या अभीर लोग ट्राइबल थे ? अभीर जंगली जनजाति ट्राइब्स थी , उनकी कम्युनिटी जंगल में रहती थी ?

उत्तर : ये भी एक झुठा प्रचार किया जाता है। ये मूलतः अंग्रेजों का फैलाया/ प्रचारित किया हुआ है। देखो , महाभारत में ही वेद व्यास ने नियम बनाया था कि गोप ग्वाल गोपाल अभीर सभी वनों में रहे वहाँ गायों के लिए पर्याप्त मात्रा में चारे आदि की बाहुलता होने से अभीर लोग वनचारी हुए करते थे और नगरों से उन्हें निषेध किया गया था। ये तो वही बात हुई कि ऋषियों का आज्ञा मानना ही दोष युक्त हो गया । पहले जिस आदेश से वनों में रहना आरंभ किया अब वही आज्ञा पालन देखकर कहते है ये गोप अभीर ट्राइबल जनजाति है । ये तो हिपोक्रेसी से अतिरिक्त कुछ नहीं।
























बागबेटानसगंताग



















• पुराणों में यादव अभीर -

यहां स्कन्द पुराण में देवी गायत्री को अभीर सूता लिखा गया है - 



पद्म पुराण में स्पष्ट रूप से लिखा है की श्री कृष्ण अभीर कुल में जन्म लेते है देखे प्रमाण -


अब अभीर सूता देवी गायत्री को देवी भागवत पुराण में स्पष्ट रूप से यादवी लिखा गया है - 



आप देख सकते है स्पष्ट रूप से अभीरो का यदुवंश से संबंध पुराणों में दर्ज है अर्थात् ये कोई नवीन कल्पना नहीं।













Tqbfahwthtwheth

प्रश्न : यदुवंशियों की जाति "अहीर" है तो ये किस कालखंड में बनी ? भारत में जातिवाद का इतिहास कितना पुराना है ?

उत्तर : पूर्वकाल में गोपालक का अर्थ सीधे यादवों से नहीं था , कुछ यादव गोपालक नहीं भी थे क्योंकि ये एक पेश है गोपालन करना। गोपालक कोई भी वंश का व्यक्ति हो सकता था क्योंकि उस काल में गाय रखना या खेती करना ही सबसे बड़ी व्यवसाय या आय इंपोर्ट एक्सपोर्ट का मुख्य साधन हुआ करती थी , संभव है यदुवंश ने इसे अधिकाधिक पालन किया इसलिए इनका संबंध काफी पुराना माना जाता है। परंतु आज से 1900-2400 वर्ष के बीच कुछ ऐसा हुआ की भारत के इतिहास ने एक नया मोड़ ले लिया । 

जी आपने बिल्कुल सही सुना पाठकगणों ! आज से 1900-2400 वर्ष पूर्व भारत में कॉस्ट सिस्टम ने पैर पसारना आरम्भ किया । यही पर भारत की लगभग ९९.९९% लोगो को जातियों के आधार पर बांटा गया । वही से यदुवंशियों ने अभीर(ग्वाल) जाति को बढ़ - चढ़कर अपने साथ लंबे समय के लिए लॉक कर लिया इसमें हम आपको नीचे प्रमाण अवश्य देंगे । अब यहां से इतिहास में कृष्ण और यदु को अभीर - गोप के रूप में जो लिखा हुआ था उसके आधार से अब यही इनकी जाति बन गई - अभीर / ग्वाल वंश । ऐसा ही हर एक जाति के साथ हुआ , ऐसा कोई भारतीय नहीं जिसके साथ इस प्रकार जाति नहीं जोड़ी गई (सिवाय वनवासी जनों के) । ये आधुनिक विज्ञान के जेनेटिक्स शोध वा डीएनए एनालिसिस में सिद्ध पाया गया है। 
(नोट - रिसर्चर्स ने 1900 वर्ष का आंकड़ा हर पीढ़ियों के लिए 29 वर्ष लेकर अनुमानित दर से निकाला है, लेकिन हम ये मानते है परंपरा में पीढ़ी दर 36 वर्ष भी लिखा हुआ है , इसलिए लगभग 1900 से 2400 वर्ष के बीच जातिवाद का उद्गम(शुरुवात) मानकर मै चलूंगा। आप भी पीढ़ियों को अधिक वर्षों से गुना करके आकड़ा निकलकर देख सकते अधिक जानकारी के लिए रिसर्च पेपर पढ़े)


अतः अब यहां से मैं यदुवंश की जाति परक संदर्भ दूंगा क्योंकि यहां से इतिहास केवल जाति से ही चला है , ये लेख अहीर समुदाय के यदुवंशी होने न होने इस विषय पर लिखी जा रही है। अतः हम आज से पीछे इस जाति की खोज पड़ताल अवश्य करेंगे नहीं तो ये लेख अधूरा माना जाएगा । इसलिए मैं अहीर जाति की ही श्री कृष्ण एवं यादवों के संबंध में प्रमाण दूंगा । यदि किन्हीं को अब भी समझ न आए की हम क्यों जाति का इतिहास यहां से बताएंगे तो वे again इस पैराग्राफ को चार बार पढ़िये, मित्रों यहां इतिहास को उसी रूप में बताया जा रहा है जिस रूप में लेखो में दर्ज है। हमे ये बात समझना होगा अहीर/अभीर बाहर से नहीं आए बल्कि उनके इनस्क्रिप्शंस इस काल के आस पास मिल ही इसलिए रहे है क्योंकि उसी काल खंड तक जातियों के स्ट्रिक्ट एंडोगेमी के प्रमाण मिले है। जाति के traces अगर हम पीछे जाए तो जिस काल में ये आधुनिक इतिहासकार अभिरो के पुरातात्विक प्रमाण देख पा रहे है एकदम सटीक रूप से उसी काल खंड में जाति व्यवस्था की शुरुवात हो रही थी। ये कोई coincidence नहीं है इस मत पे मैं मजबूती से अडिग हूं। अभीर मूलनिवासी ही है , परंतु जातियों का जो आपसी समागम( इंटरकास्ट mixing या विवाह) लगभग 1900-2400 वर्ष पूर्व से बंद हो गया था और मैं कहता हूं इसी काल से जातियां विभक्त होकर सीधे lock 🔒 हो गई। भारतीय जातियों ने एंडोगेमी को बेहद strictly follow किया , इसके वैज्ञानिक प्रमाण आज हमारे पास है ये हमारे जातियों में पहचान के रूप में विभक्तिकरण का exact प्वाइंट है जहां से जातिवाद का विकास होने लगा। यादव ही आगे किसी काल खंड में स्वयं को जन्म से अहीर गोप ग्वाले कहने लगे और कॉस्ट बन गया । बस हम इस विकास की जांच पड़ताल में आज से इतिहास में पीछे जा रहे है अब इसी इतिहास में मध्य में एक जातिवादी काल आता है इसलिए उसके प्रमाण भी देना हमे आवश्यक है नहीं तो ये शोध अधूरा माना जाएगा । आखिर कैसे ये क्रम चला । क्योंकि सामने से सवाल ही ऐसा किया गया है ।

प्रश्न : अंग्रेजों ने कुछ जातियों को दासीपुत्र जैसे बाते लिखे क्या वो सत्य है ? 

उत्तर : ये अपशब्द प्रायः लोग कहते रहते है परंतु इसमें तिल बराबर भी सत्यता नहीं । जहां ये एक नीच सोच को प्रदर्शित करता है वही ये अपने अपने जाति की उच्चता के झूठे घमंड को पोषण करते है। इसी विषय की पड़ताल में आज डीएनए का सबूत निकलकर आया है , उपरोक्त डीएनए एनालिसिस ये बताती है आज से दो सहस्र वर्ष पूर्व लगभग भारत के सारी जातियां आपस में वैवाहिक संबंध बना रही थी । आजसे २००० वर्ष पूर्व सारी जातियां एक - दूसरे जाति में भरी मात्रा में intermixing कर रहे थे (रोटी बेटी का संबंध था)। इसलिए झूठे तथ्य रखकर भारत में फालतू भेदभाव या इस जैसी बकवास न फैलाए । जिन्हें शक हो वे अपना और अपने बच्चों का डीएनए जांच करवाए किसके वंश में कितना शुद्ध रक्त है ये अपने आप समझ आ जाएगा ! 

अब भगवान श्री कृष्ण के यदुवंशी अहीर होने के प्रमाण -

•  "वज्जालग्गं" (लगभग ७५० ईस्वी रचित) एक प्राकृत सुभाषित-संग्रह है, जिसके संकलक आचार्य जयवल्लभ माने जाते हैं। इसकी ६०४वीं गाथा में लिखा है कि, हे केशव! तुम नन्द गोप के घर के दूध पर पले-बढ़े हो, इसलिए तुम आभीर (अहीर) ही हो, इसमें कोई संदेह नहीं। देखे प्रमाण -




• राजस्थान के चित्तौड़गढ़ राजघराने की बहु मीराबाई 16वीं शताब्दी की एक महान कृष्ण भक्त, संत और कवयित्री थीं। इनका विवाह 1516 ई. में मेवाड़ के युवराज भोजराज सिंह सिसोदिया (महाराणा सांगा के पुत्र) के साथ हुआ था। इन्होंने अपने दोहे में श्री कृष्ण महाराज को अहीर जात का बताया -




• Rajasthan Prihthviraj raso book -






राजस्थान 
















• १६ वि सदी के राजस्थान के महान संत कवि ईश्वरदास बारहठ द्वारा रचित "हरिरस" , जिसमें उन्होंने अपने दोहा में श्री कृष्ण महाराज को अहीर यादव कुल में अवतीर्ण माना है -


















• रसखान ने अपने ग्रंथावली में गोपियों को अहीर के छोरिया लिखा है [गोप = अहीर]

१६वि शताब्दी में रचित

• महाकवि संत सूरदास ब्रजवासीयो के लिए अहीर शब्द लिख रहे है । खुद ब्रज की परंपरा जानती है वे अहीर है या नहीं -




आगे ब्रजक्षेत्र के ही महान प्रज्ञाचक्षु सूरदास संत लिखते है - 
नन्द और यशोदा से कृष्ण का संबंध कभी नहीं छूट सकता, वेद-पुराण भी यही कहते हैं। 
हम अहीर हैं और तुम(कृष्ण) भी "अहीर" हो ! चाहे लाखों दशाएँ/परिवर्तन हो जाएँ, चाहे कितना ही बाहरी उपाधिया मिल जाए (राजा इत्यादि की) , इससे हमारा और तुम्हारा मूल संबंध नहीं बदलता। यहीं तुमने बचपन के खेल खेले थे। यहीं तुम्हें उखल (ओखली) से बाँधा गया था (दामोदर लीला का संकेत) । सूरदास कहते हैं, हमारे हृदय में यही शूल (पीड़ा) चुभ रही है कि कृष्ण फिर दर्शन नहीं देते।


( यहां इन पंक्तियोमें सूरदास जी के भावके आगे समस्त विश्व नतमस्तक हो जाता है , क्या भाव प्रकट किया है यशोदा कृष्ण विरह पर लाजवाब ! अद्भुत ! अद्वितीय कृति ! ) 

१६वि शताब्दी के गोस्वामी रघुनाथदास रचित अभीष्ट सूचना स्त्ववाली में श्री कृष्ण को अभीरपल्ली ग्राम के स्वामी का पुत्र लिखा मिलता है -













• महाभारत में श्री कृष्ण को ब्रज क्षेत्र त्यागने के बाद भी गोप ग्वाला कहा कहा लिखा हुआ है -








यहां इनको क्षत्रिय से अलग एक ग्वाला लिखा है।


दोनों ग्वाल गोपों को ही जरासंध यादव कह रहा है





























प्रश्न : क्या यदुवंश में उत्पन्न होने से अपने आपको महान , उच्च या फिर देवता तुल्य समझना उचित है ?

उत्तर : ये गलत मार्ग पे जाने का समर्थन मै नहीं करता । यही वो अंधविश्वास है जिससे अच्छे से अच्छा कुल पतन की ओर बढ़ता है । किसी महापुरुष ने हमारे कुल में जन्म लिया इसका ये अर्थ क्यों लिया जाए की उनकी महानता उनके वंशजों में भी pass through होगी बिना कर्म किए ? मै इस चीज के सख्त खिलाफ हूं! मै तो यही message दूंगा भले दूसरे ये मान्यता का पालन करे परंतु हमे ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सत्य भी नहीं। इसी यदुकुल में कंस भी उत्पन्न हुआ और योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी भी । उनके वंशजों में भी कर्मफल से कुछ पापी बनेंगे और कुछ पुण्यवान भी। अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छे फल(results) की प्राप्ति होगी , बुरे करेंगे तो बुरा फल। इसलिए पूर्वजों का गुणगान करो उनको अपना आदर्श समझो लेकिन ये कहना गलत है की हम भी उनके जैसे महान हो गए क्योंकि हमारा जन्म इस कुल में हुआ। ये अभिमान आपके अंदर अनेक दुर्गुणों को उत्पन्न करता है इसलिए मैं अहितकर बात नहीं करूंगा। यदि कोई यदुवंशी दुष्ट हो तो उसका समर्थन हमे नहीं करना चाहिए भले एक सीमा तक उसे अनदेखा किया जा सकता है क्योंकि छोटी मोटी बातों पर वैर कर लेना मूर्खता है , एकता के साथ रहे।









द्वितीय लेख 

हमे ये बात पता है कि इस लेख में पूर्व के आक्षेपों का खंडन करने के बाद भी भविष्य में वही आक्षेप दोहराए जायेंगे । इसलिए हम ऐसा लेख लिखेंगे जिसके बाद जरूरी नहीं होगा हर एक आगे आने वाली आक्षेप का उत्तर देना । इसी लेख से उसका भी समाधान हो जाएगा । 

हम माभारत आदि प्राचीन इतिहास से प्रमाण देंगे 
अनेक मतों से पुष्ट 

निष्पक्ष रिसर्च करने का प्रयास 


बुद्धिमता पूर्ण और जिज्ञासा से किए गये प्रश्नों एवं चर्चाओं का स्वागत है अन्यों को इग्नोर किया जाएगा । 

अंत में गोविंद 

• पूर्वपक्ष : पर हम तो श्री कृष्ण के नाम से गोप गोपाल अहीर सब हटाकर ही रहेंगे क्योंकि वो यादव है और क्षत्रिय भी, चरवाहे नहीं -

उत्तर : लो अलग करवा लो यदि इतना ही सामर्थ्य हो तो -





प्रश्न - आप तो जातिवादी लगते हो राज जी !

उत्तर - एक आर्य विद्वान है पंडित शिवपूजन सिंह कुशवाहा इनकी पुस्तक है - क्या अहीर जाट गुजर विदेशी है या मूल निवासी चन्द्रवशी क्षत्रिय । एक बार इस पुस्तक को पढ़ लीजिए और फिर कहियेगा मै इतिहास बता रहा हूं या जातिवाद । हमारा यहां यादव वंश/lineage के इतिहास को trace out करना ही लेख का मुख्य उद्देश्य है , क्या कोई कह सकता है वे सब आर्य विद्वान भी जातिवादी थे ? या आपको ही इतिहास और जातिवाद के बीच अंतर करने की समझ नहीं । और कुछ स्पष्ट करने की इससे ज्यादा हमे आवश्यकता नहीं , इतना उत्तर पर्याप्त है।  


मुझे लगता है और कुछ सिंह करने की जरूरत नहीं 


Rygebebyej


• अंत में एक और आक्षेप - वाल्मिकी रामायण में अभिरो को पापी दस्यु कहा गया है ये बड़ौदा क्रिटिकल एडिशन में श्लोक प्रक्षिप्त है इसके लिए हमारी ये वीडियो देखे -




हमारा इस विषय पर प्रथम लेख भी पाठकों के लिए द्रष्टव्य है (बहुत सारे प्रमाण से युक्त ये लेख भी जबरदस्त है लिंक पर जाए ) - 



इसी के साथ लेख हुआ समाप्त ! मित्रों , इस लेख को अधिक से अधिक लोगों में शेयर अवश्य करे । फिलहाल हमारी ओर से इस विषय का यही द्वितीय और अंतिम लेख है काफी विस्तार को प्राप्त हो गया परंतु हमने हर एक आक्षेप का समुचित उत्तर देने का प्रयास किया है। हमारे इस लेख में किसी भी अन्य समाज (यदुवंश बाह्य) के बारे में कोई चर्चा नहीं है , और न ही उनसे कोई हमे आपत्ति वा द्वेष जैसी कोई चीज है इसलिए इसे अन्यथा भी न लेवे और केवल यदुवंशियों के लिए इस लेख विषय पर चर्चा का हम स्वागत करते है अन्यों के लिए नहीं। आगे भी हमसे जुड़े रहे अलग अलग विषयों पर लेख आदि जानकारियां प्रदान करते रहेंगे अस्तु । सादर नमस्ते । 🙏



जय श्री कृष्ण ! जय माधव !

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