YADAVA DYNASTIES: TRACING THEIR HISTORY THROUGH INSCRIPTIONS

YADAVA DYNASTIES: TRACING THEIR HISTORY THROUGH INSCRIPTIONS

  

 — Raj Arya




    
पाठकगणों ! यदुवंश के इतिहास सीरीज का यह प्रथम लेख आज आपके समक्ष प्रस्तुत है । हमारे इस लेख में हम आपको कुछ यदुवंश के साम्राज्यों के पुरातात्विक अभिलेखों एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों से अवगत करवाएंगे । जिनके बिना यदुवंश का इतिहास कुछ अधूरा रह जाता है इसलिए अंत तक धैर्य के साथ पढ़िए :- 

1) Abhira Dynasty (Maharashtra)




महाराज ईश्वरसेन आभीर (Mathariputra Ishwarsena or Mahaksatrapa Ishvarsena): इतिहास में मूल आभीर साम्राज्य के संस्थापक के रूप में प्रतापी महाराज ईश्वरसेन को जाना जाता है। महाराष्ट्र की विशाल बलशाली सातवाहन राजवंश को अंत करने में इन अभीर (ग्वाल) राजाओं का महत्वपूर्ण भूमिका इतिहास में दर्ज है। महाराज ईश्वरसेन जी से ही लगभग दूसरी शताब्दी के अंत में 'आभीर संवत' (Abhira Era) की शुरुआत हुई थी। यह ‘आभीर संवत’ (Abhira Era) इतिहास में मुख्य रूप से दूसरी - तीसरी शताब्दी ईसवी से लेकर 13वीं शताब्दी ईस्वी तक (लगभग 1000 से अधिक वर्षों तक) सक्रिय रूप से अनेक राजवंशों में पालन होता रहा। इससे आप विचार कर सकते है आभीर क्षत्रिय राजाओं का शासनिक प्रभाव इतिहास में कैसा रहा होगा। 

आभीर संवत की शुरुआत राजा ईश्वरसेन द्वारा 249 ईस्वी में की गई थी और यह लगभग 963 वर्षों तक यानी 1212 ईस्वी तक भारत के विभिन्न राजवंशों द्वारा अपनाया गया। शुरुआत में सन् 249 से 375 ईस्वी तक नासिक, खानदेश (=कान्ह देश) और पश्चिमी दक्कन क्षेत्र में मूल आभीर (अहीर) राजवंश के राजाओं ने इसका पालन किया, जिसके बाद सन् 375 से 500 ईस्वी के दौरान कोंकण, सूरत और दक्षिणी गुजरात में सक्रिय त्रैकूटक आभीर राजवंश ने इसे आगे बढ़ाया। इसी बीच सन् 350 से 415 ईस्वी के कालखंड में मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी में शासन करने वाले वल्खा के महाराजों ने भी अपने राजकीय पत्रों में इसी संवत का प्रयोग किया। आगे चलकर सन् 550 से 625 ईस्वी के मध्य मालवा, गुजरात और महाराष्ट्र क्षेत्र के महिष्मती के प्रारंभिक कलचुरी राजाओं ने इसे पूरी तरह अपनाया और अंततः सन् 900 से 1212 ईस्वी तक बुंदेलखंड (मध्य प्रदेश) और छत्तीसगढ़ के त्रिपुरी व रतनपुर के उत्तरवर्ती कलचुरी राजवंश ने इस संवत का सबसे लंबे समय तक पालन कर इसे इतिहास में अमर कर दिया।

यदि हम नवंबर 2026 में इसकी गणना निकाले तो 2026-248 = 1778th year; अर्थात आभीर संवत अनुसार आज की डेट में 1778 वा अभीर संवत् वर्ष चल रहा है, यदि 248 ईस्वी को उसका प्रारंभिक वर्ष मानकर सीधी गणना की जाये । 




यहां अभिलेख में राजा ईश्वरसेन को पिता के नाम से पूर्व उनके माता जी के नाम से पहचान लिखी गई है । पूर्व काल में केवल आर्यावर्त के राजाओं में ही माता के नाम से भी पुत्र की प्रसिद्धि होने की सुंदर प्रथा हुआ करती थी , (उदाहरण- कुंतीपुत्र अर्जुन , देवकीनंदन कृष्ण , राधेय कर्ण , गंगापुत्र भीष्म आदि) जो की आज बदलकर केवल पिता के नाम के साथ सीमित हो गई है ।


अब हमें आंध्र प्रदेश के नागार्जुनकोंडा से एक अभिलेख प्राप्त होता है, जिसमें एक प्रतापी आभीर क्षत्रिय राजा वसिष्ठीपुत्र वसुषेण का वर्णन है , जिनके शासनकाल के 30वें वर्ष लगभग 278–279 ईस्वी (तीसरी शताब्दी ईस्वी) के इस अभिलेख में सतगिरि पर भगवान अष्टभुजस्वामिन् (भगवान नारायण के एक स्वरूप) की प्रतिमा स्थापित किए जाने का उल्लेख हुआ है। यह अभिलेख उस धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े राजकीय संरक्षण, प्रशासनिक अधिकारियों तथा विशिष्ट दानदाताओं के योगदान पर भी प्रकाश डालता है देखे -








Gunda Inscription Of Abhira Rudrabhuti-










‘महाक्षत्रप’ ईश्वरदत्त अभीर के राजकीय सिक्के -

2) Traikutaka Dynasty (Maharashtra)

जब चौथी-पाँचवीं शताब्दी में मूल आभीर साम्राज्य का विघटन हुआ, तो अभीर वंश के सामंतों या एक शाखा ने त्रैकूटक राजवंश की स्थापना की। 
पश्चिमी महाक्षत्रप इंद्रदत्त आभीर : महाराजा इंद्रदत्त को इस त्रैकूटक वंश का संस्थापक माना जाता है, जिन्होंने कोंकण और दक्षिणी गुजरात क्षेत्र पर शासन किया। इनके पुत्र महाराज दहरसेन के सिक्कों पर पिता इंद्रदत्त का नाम प्राप्त होता है।





इस अभिलेख में प्रतापी आभीर राजा दहरसेन का उल्लेख है आर्यावर्त में अश्वमेध यज्ञ संपन्न करवाने वाले राजाओं के लिस्ट में ये अभीर राजा का भी नाम अंकित है (जो कहते है अभीर का वर्ण क्षत्रिय नहीं , वे अश्वमेध यज्ञ पे क्या कहेंगे) , अभिलेख नीचे संलग्न है -






अब कुछ इनके सिक्कों पे उत्कीर्ण किए गए इनके टाइटल्स को भी पढ़े -





आप देख सकते है इन राजाओं ने अपने राजकीय सिक्कों पर परम वैष्णव अंकन करवाया हुआ है। पुराणों में वैष्णव को कृष्ण से उत्पन्न कहा गया है , विचार कर सकते है जिस काल में कृष्ण के वंशजों या वैष्णव /भागवत ने ये प्रसिद्ध किया था उसी काल में अभीर राजा इस सर्वोच्च उपाधि को धारण कर रहे होंगे। 

From The coinage of the Traikūṭaka Abhira rulers clearly indicates that they were Parama Vaiṣṇavas and adherents of the Bhagavata tradition.
The following Traikuta rulers (Abhiras) are known from the coins and inscriptions of Gupta period-

Maharaja Indradatta (AD 415-440, only mentioned on the coins of his son)

Maharaja Dahrasena, son of Indradatta (A.D. 455), he performed Ashwamedha yajna.

Maharaja Vyaghrasena, son of Dahrasena (A.D. 480)

Maharaja Madhyamasena, son of Vyaghrasena (A.D. 504)

Maharaja Vikramasena, son of Madhyamasena (A.D. 533)

3) Abhira Gupta Dynasty (Nepal)

Partition से पूर्व भारत के नेपाल क्षेत्र में प्रारंभिक लिच्छवी काल के दौरान, आभीर ( अहीर या यादव ), जो पांचवीं शताब्दी ईस्वी से पहले उत्तरी भारत के मथुरा क्षेत्र से चलकर नेपाल में बसे थे , प्रशासन में लगातार बढ़ते पद पर आसीन होते गए । इन्होंने स्वयं अपनी dynasty चलाई अभिर -गुप्त राजवंश एक ऐसा राजवंश था, जिसके बारे में माना जाता है कि यह आधुनिक नेपाल में काठमांडू घाटी में अस्तित्व में था । इनका राजवंश काफी लंबे समय तक नेपाल पर राज करता रहा।

इनमें अभीर गुप्त वंश के कुछ शासकों में नाम शामिल हैं:
रविगुप्त (532 ईस्वी)
भौमगुप्त (567–590 ईस्वी)
जिष्णुगुप्त (624–637 ईस्वी)
विष्णुगुप्त (638–643 ईस्वी)






राजा जिष्णुगुप्त के ठानकोट अभिलेख में स्पष्ट रूप से आप देख सकते है गोमिन = गोप = चंद्रवंशी एक साथ आया हुआ है। अर्थात् अभीर और गोप चंद्रवंशी क्षत्रिय एवं राजा होते है, देखे पाठक गण -





यहां मानगुप्त गोमिन् को राजा जिष्णुगुप्त के प्रपितामह (परदादा) के रूप में बताया गया हैं। उन्होंने एक जलाशय बनवाया था। शुरुवाती पंक्तियों में ‘गोप’ शब्द भी लिखा हुआ है लेकिन किसको कहा जा रहा है ये पंक्तियां क्षतिग्रस्त होने से अस्पष्ट है , इसलिए हम कोई दावा नहीं करेंगे इसपे । परंतु इस शिलालेख से हमे यह ज्ञात हुआ कि ये वंश गोमिन समुदाय से संबंधित था।

अब अभीर गुप्त राजवंश के इतिहास पर एक और महत्वपूर्ण प्राचीन अभिलेख प्रस्तुत है इसे भी पढ़े । नेपाल के काठमांडू में स्थित प्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ मंदिर के प्रांगण में शिवलिंग की पीठिका पर यह अभिलेख उत्कीर्ण है -  




इस अभिलेख में स्पष्ट रूप से अभीर = गोमिन = गोप सिद्ध होता है देखे -



इस अभिलेख में एक आभीरी जो गोमिनी पहचान से वर्णित है जिसने अपने दिवंगत पति के पुण्य की वृद्धि के लिए अनुपरमेश्वर शिवलिंग स्थापित करवाया था। यह उसके पति की स्मृति और उनके परलोक-कल्याण से जुड़ा धार्मिक कार्य था। इस अभिलेख से पता चलता है उल्लेखित आभीरी गोमिनी जो स्त्री यहां वर्णित है वह परमाभिमानी (परमगुप्त) के पुत्र की पत्नी थी और उसके संतानों में भौमगुप्त का नाम उल्लेखित किया गया है। पूर्वोक्त ठाँकोट अभिलेख में जिष्णुगुप्त अपने प्रपितामह मानगुप्त गोमीन का उल्लेख करता है। विद्वानों ने भौमगुप्त गोमिन को जिष्णुगुप्त के दादा के रूप में माना है ।

अब देखे चौथी शताब्दी के प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ अमरकोश में "गोमिन" शब्द का अर्थ गायों का स्वामी या पालक ही बताया गया है जिस पदवी से नेपाल का यह अभीर गुप्त राजवंश प्रसिद्ध हुआ है(यह कोश इन्हें वैश्य वर्ग में रखता है) -



अब देखे , नेपाल में एक प्रसिद्ध कैलाशकूट राजभवन हुआ करता था जिसका निर्माण अंशुवर्मा ने करवाया था।। अंशुवर्मा के बाद में , आभीर-गुप्त राजवंश (जिन्हें इतिहास में केवल गुप्त या महिषपाल/अहीर वंश भी कहा गया) के वास्तविक शासक जिष्णु गुप्त ने नेपाल की वास्तविक प्रशासनिक सत्ता अपने हाथों में ले ली। नेपाल के प्राचीन इतिहास में प्रसिद्ध कैलाशकूट भवन में मुख्य रूप से आभीर-गुप्त वंश के शक्तिशाली शासक जिष्णुगुप्त और उनके पुत्र विष्णु गुप्त रहते थे। जिसका वर्णन चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपने भारत के यात्रा वृतांत में किया हुआ है ।

चित्र : जिष्णुगुप्त और विष्णुगुप्त का कैलाशकूट राजभवन 

अब देखे , इसी राजभवन से जुड़ी जानकारियों के विषय में हमे काठमांडू के नक्साल क्षेत्र में स्थित नारायणचौर से जयदेव द्वितीय (713–733 ई.) का एक अभिलेख प्राप्त होता है। यह नारायणचौर अभिलेख अभीर राजा जिष्णुगुप्त और विष्णुगुप्त दोनों के बाद के समय का माना जाता है। 




चित्र : ५१वे पंक्ति स्पष्ट रूप से जिष्णुगुप्त के राजभवन में
 ‘यदु द्वार’ का वर्णन अर्थात् यदु के नाम से जाना जाता था  



The Ancient Settlements of the Kathmandu Valley के पृष्ठ 243 से इस पैलेस का वास्तु नक्शा

आप देख सकते है इस राजभवन के वास्तु नक्शे पर किस प्रकार द्वार का नाम जिष्णुगुप्त और विष्णुगुप्त अभीर राजाओं ने अपने काल में यदु के नाम से प्रसिद्ध किया। जिसका अभी हमने ऊपर जयदेव द्वितीय के शिलालेख में भी वर्णन देखा । 
इससे एक बात तो यहां स्पष्ट हुआ नेपाल का अभीर गुप्त राजवंश चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश , गोमिन वंश (अर्थात् गोपवंशी) , अभीर वंश और यदुवंशी नामों से प्रसिद्ध था । यानी अब तक क्या सिद्ध हुआ ? अभीर = गोप = चंद्रवंशी क्षत्रिय = यदुवंशी । 

आगे कुछ नेपाल के सरकारी रिकॉर्ड्स एवं शोधों से कुछ जानकारियां संलग्न करते है —


















4) Chudasama Abhir Dynasty (Gujrat)


चूड़ासमा आभीर राजवंश गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में शासन करने वाला एक प्रमुख राजवंश था। इसकी सत्ता का प्रमुख केंद्र गिरनार और जूनागढ़ के आसपास था। इस राजवंश के शासकों का इतिहास वंथली, जूनागढ़ और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। इनके शासनकाल को सामान्यतः मध्यकाल से जोड़ा जाता है, विशेषकर लगभग 9वीं–15वीं शताब्दी के बीच।



हमे जूनागढ़ से प्राप्त अभिलेखों में इनके बारे में ज्ञात होता है कि चूड़ासमा राजाओं ने अपने साम्राज्य का संबंध यदु वंश से बताया था। उन्हें ‘राणा’ और ‘महाराणा’ की उपाधियों से संबोधित किया गया, जो उनकी क्षत्रिय पहचान तथा यदुवंशी परंपरा से उनके संबंध को दर्शाता है -









फिर हमे गिरनार के अभिलेखों में इस राजवंश की विस्तृत वंशावली मिलती है जो सीधे महाराज यदु से कृष्ण से चलती हुई आई है और मजे की बात है ये वंश अभीर है । वंथली और चोरवाड़ में प्राप्त अभिलेख भी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि चूड़ासमा राजवंश की उत्पत्ति यदुवंशी क्षत्रिय परंपरा से जुड़ी थी। इस राजवंश के शासक अपने नामों के साथ प्रायः ‘राणा’ और ‘महाराणा’ जैसी उपाधियों का प्रयोग करते थे -







अब देखे आचार्य मेरुतुंग (1306 CE) अपने प्रबंध चिंतामणि में चूड़ासम्मा राजवंश के Ra' Navghan को स्पष्ट रूप से "अभीर राणा" लिखते है ! यानी राणा तो थे किंतु अभीर वंशी राणा थे ये सभी (इससे ये स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में "राणा / महाराणा" जैसे titles किसी एक जाति के लिए ही प्रयोग नहीं होती थी) -

यह भी अभीर के यदुवंशी होने के प्राचीन प्रमाणों में से एक है 


अब देखे आचार्य हेमचंद्र सूरी (लगभग 1088–1172/1173 ईस्वी) ने अपने ग्रंथ द्व्याश्रय काव्य में महान चूड़ासमा राजाओं का वर्णन स्पष्ट रूप से ‘आभीर’ समुदाय के क्षत्रियों के रूप में किया है। यह उल्लेख दर्शाता है कि आभीर शासकों को प्राचीन काल से ही क्षत्रिय माना जाता था तथा चूड़ासमा महाराणाओं का वंश आभीर-यादव परंपरा से संबंधित था -


इसके बाद , चूड़ासम्मा राजवंश के अभिलेखों में अहीर क्षत्रियों के युद्ध में वीरगति प्राप्त करने पर अनेक अभिलेख भी लिखवाए गये है, ये दर्शाता है कि गोप/अभिरो का महत्व इस राज्यकाल में कितना रहा होगा -





5) Seuna Dynasty (Yadavas of Devgiri, Maharashtra)

देवगिरी के सेउना यादव वंश : मध्यकालीन महाराष्ट्र का महान राजवंश । दक्कन में जन्मे सेउनदेव यादव (लगभग 850 — 1317) की शुरुआत मामूली थी। उनकी शुरुआत कन्नड़ बोलने वाले दक्कन में हुई थी , जहाँ उन्होंने सबसे पहले महाराष्ट्र में आज के नासिक के पास सिन्नर में अपनी सत्ता की जगह बनाई थी । लेकिन किस्मत में कुछ और ही लिखा था — वे मिडिल एज इंडिया के सबसे ताकतवर वंशों में से एक बनने वाले थे।

9वीं सदी के आखिर तक , सेऊना राष्ट्रकूटों के सामंतों के तौर पर उभरे , और बाद में पश्चिमी चालुक्यों के साथ मिल गए । समय के साथ, उन्होंने अपनी आज़ादी का दावा किया, खासकर भीलमा V के राज में, जिन्होंने लगभग 1187 CE में राजधानी को देवगिरी (आज का दौलताबाद) में शिफ्ट कर दिया । सभी को विदित हो की इसी वंश में आगे चलकर मराठा साम्राज्य के महानायक छत्रपति शिवाजी महाराज की माता श्री जीजाबाई ने जन्म लिया था । शिवराय को हिंदुत्व के लिए लड़ने और शौर्य का सारा शिक्षण देने वाली राजमाता श्री जीजाबाई का जन्म यदुवंश घराना में ही हुआ था । ऐसे वीरोत्तम कुलधर्म को कोटि कोटि नमन है जहां माता जीजाबाई जैसी वीरांगनाएं निकलती हो (आजकल कुछ हिन्दू इन देवगिरि के यादवों का अपमान करते हुए मिल जाएंगे , उन मूर्खो को हिंदू किस हेतु से माना जाए ?)


 चित्र : सेउना यादवों की राजधानी देवगिरी का किला — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम


Picture: Magnificent Gondeshwar Mandir in ‘Hemadpanthi’ style located in Sinnar, Nashik, Maharashtra— इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम

 

गडग अभिलेख, यादव राजा भिल्लम — शक संवत् 1113 (1191 ईस्वी) -

कर्नाटक के गडग स्थित त्रिकूटेश्वर (शिव) मंदिर के पत्थर पर उत्कीर्ण यह संस्कृत अभिलेख नागरी लिपि में लिखा गया है। इसमें यादव वंश की वंशावली देते हुए राजा सेउनदेव, मल्लुगीदेव, कर्णदेव और भिल्लमदेव का उल्लेख मिलता है जो इस साम्राज्य के संस्थापक माने जाते है । अभिलेख में यादवों को राजर्षि यदु के कुल से उत्पन्न बताया गया है। इसमें राजा भिल्लम के शासनकाल में धार्मिक दान के अंतर्गत एक गाँव की भूमि त्रिकूटेश्वर मंदिर को दिए जाने का भी वर्णन है। देखे अभिलेख -





अब इन देवगिरि के यादवों के विषय में बॉम्बे गजेटियर से हमे ज्ञात होता है कि ये महाराष्ट्रीय मूल के अभीर गवली राजाओं के ही एक शाखा थे । होंगे भी क्यों न इन्होंने अपने वंश को श्री कृष्ण से बताया है वे गोप थे , उनके पिताश्री वसुदेव जी गोप थे हरिवंश पुराण अनुसार इसी कारण हमें 96 मराठा कुलों में अहिरराव और यादव जैसे उपनाम भी मिलते हैं। अतः मूलरूप से उनके वंशज अभीर/गवली वंश लगा सकते है -






अंबे जोगाई के यादव अभिलेख: इस अभिलेख में शक्तिशाली आभीर राजा लक्ष्मीदेव से संबंधित युद्ध का वर्णन मिलता है। राजा लक्ष्मीदेव ने सिंघणदेव की विजय से पहले खानदेश (भाम्भागिरी) पर शासन किया था , अनेक विद्वानों ने अनुमान से इन दोनों को एक ही मूल का बताया है -



अब कुछ लोग कहेंगे सेउना के सिंघनदेव का युद्ध लक्ष्मीदेव अभीर से हुआ इसलिए ये दोनों शायद अलग होंगे । ऐसे ही लोगों को इतिहास की समझ नहीं होती क्योंकि युद्ध कभी वंश या race देखकर नहीं हुआ करती । राजाओं के युद्ध का सदैव कारण राज्य का विस्तार , उच्च राज्यपद या सत्ता प्राप्त करना , शक्तिसंपन्न बनने का स्वार्थ , शक्तिप्रदर्शन दिखा अपने शासन अधिपत्य स्थापना आदि कारणों एवं लाभ / हानि नीतियों के तहत ही होता हुआ आया है न की racism इसका मुख्य कारण होता है । इन कारणों के उपस्थित होने पर राजा सामने यदि स्वयं का कुल ही क्यों न हो उनसे युद्ध कर लेते थे । पूर्वकाल में कौरव पांडव के बीच हुए महाभारत युद्ध को ही देखे , क्या आपके इसी तर्क से वे भी अलग अलग वंश के हो जाएंगे या एक ही वंश के भाई कहलाएंगे ? आगे इस तरह के कुछ उदाहरण हम नीचे भी दे रहे है - 

देवगिरी का सेउना यादवो का होयसाल यदुवंशियों से युद्ध :

होयसाल साम्राज्य (कर्नाटक) का सबसे लंबा और ऐतिहासिक संघर्ष देवगिरी के सेउना यादवों (महाराष्ट्र) के साथ हुआ।• दोनों ही राजवंश खुद को यदुकुल का बताते थे, लेकिन उपजाऊ कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए इनके बीच लगभग 124 वर्षों (1187-1311 ईस्वी) तक निरंतर युद्ध चला।

• होयसल राजा वीर बल्लाल द्वितीय का देवगिरी के यादव सम्राट भीलम पंचम के साथ प्रसिद्ध 'सोरातुर का युद्ध' (1189 ईस्वी) हुआ था, जिसमें होयसलों की जीत हुई। बाद में देवगिरी के प्रतापी राजा सिंहन द्वितीय ने होयसलों को हराकर उत्तरी क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर लिया था।

इसी तरह विजयनगर साम्राज्य के यादवों का भी अन्य यादवों से युद्ध इतिहास में दर्ज है - 

• गोल्ला यादव/कंबलम नायक (आंध्र और तेलंगाना के स्थानीय यादव शासक): विजयनगर के शुरुआती दौर में कृष्णा और गोदावरी डेल्टा के क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय गोल्ला यादव नायकों और सरदारों के साथ उनके सीमाई संघर्ष और बाद में रणनीतिक गठबंधन हुए।

• कलक्काड के चेरा/यादव राजा (तमिलनाडु-केरल सीमा): विजयनगर साम्राज्य के विस्तार के दौरान (विशेषकर राजा कृष्णदेवराय के समय), दक्षिण के स्थानीय राजवंशों और वेनाड (त्रावणकोर) के शासकों, जिन्हें कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में स्थानीय यादव (जयासिम्हा वंश) शाखाओं से जोड़कर देखा जाता है, के विद्रोहों को दबाने के लिए विजयनगर की सेनाओं ने युद्ध लड़े थे।

क्या इन लड़ाइयों का भी ये निष्कर्ष निकाल सकते है की यहां कोई कुलभेद था इसलिए लड़ाइयाँ लड़ी जा रही थी ? वंशभेद का जब अभिलेखों पर किसी राजा ने जिक्र ही नहीं है तो क्यों ऐसे मनमाने फर्जी अनुमान किए जाते है। कहा लिखा हुआ है हम यदुवंशी है तुम नहीं हो इसलिए तुमसे युद्ध हो रहा है ? ये तो बड़ा ही हास्यास्पद कुतर्क है इन लोगों का।


6) Hoysala Dynasty (Karnataka)

होयसला साम्राज्य एक प्रमुख दक्षिण भारतीय राजवंश था जिसने 11वीं और 14वीं शताब्दी ई. के बीच वर्तमान कर्नाटक के अधिकांश हिस्से, साथ ही तमिलनाडु और दक्षिण-पश्चिमी तेलंगाना के कुछ हिस्सों पर शासन किया था। शुरुआत में इसकी राजधानी बेलूर में स्थित थी , जिसे बाद में हालेबिदु में स्थानांतरित कर दिया गया । इनका इतिहास में संबंध प्रसिद्ध वैष्णवाचार्य श्री रामानुजाचार्य से भी जुड़ा रहा ।
आप सभी ने दक्षिण के प्रसिद्ध स्थापत्य - कलात्मक मंदिरों के ये सुंदर नक्काशीयो को तो अवश्य देखे ही होंगे ये इसी राजवंश की देन है -


चित्र : बांसुरी के साथ श्री कृष्ण — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम


चित्र : होयसला राजवंश के कर्नाटक के बेलूर (Belur) स्थित चेन्नाकेशव मंदिर (Chennakeshava Temple) में प्रसिद्ध मदनिका (नर्तकी अप्सरा) — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम


चित्र : हालेबिदु में होयसलेश्वर मंदिर — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम

होयसल वंश का यदुवंशी होने का अभिलेख (प्रमाण) -










 

7) Yadava-Varman Dynasty (Uttarakhand & Bengal)

बंगाल प्रदेश का ‘वर्मन राजवंश’ यादव (यदुवंशी) मूल का माना जाता है। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस राजवंश को अक्सर "यादव-वर्मन वंश" (Yadava-Varman Dynasty) के नाम से संबोधित किया गया है। यादव वर्मन राजवंश का इतिहास प्रारंभिक मध्यकालीन भारत से संबंधित है। इस राजवंश की एक शाखा ने लगभग 4वीं से 8वीं शताब्दी ईस्वी के बीच सिंहपुर (Simhapura) क्षेत्र में शासन किया, जबकि इसके वंशजों का संबंध बाद में पूर्वी बंगाल और कलिंग क्षेत्र से भी बताया गया है। इस राजवंश के अभिलेखों में इसकी उत्पत्ति यदुवंश से बताई गई है तथा वे स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के वंश से जोड़ते थे। सातवीं शताब्दी के लखामंडल अभिलेख और बारहवीं शताब्दी के भोजवर्मन के बेलावा ताम्रपत्र में इस वंश की यदुवंशी परंपरा का उल्लेख मिलता है।


उत्तराखंड के लाखामंडल से हमे एक 6वीं शताब्दी का अभिलेख प्राप्त होता है जिसमें सिंहपुरा (या सिंहपुर) के राजपरिवार से जुड़ी एक राजकुमारी ईश्वरा का उल्लेख हुआ है। राजकुमारी ईश्वरा यादव कन्या थी उन्होंने अपने दिवंगत पति चंद्रगुप्त (जो जालंधर के राजकुमार थे और एक हाथी के गिरने से हुई मृत्यु का शिकार हुए थे) की याद और उनके आध्यात्मिक कल्याण के लिए लाखामंडल में भगवान शिव के मंदिर का निर्माण कराया था। इस 23-श्लोकों वाले संस्कृत अभिलेख में सिंहपुर के यदुवंशी राजाओं और उनके 18 पीढ़ियों तक के वंशक्रम की जानकारी मिलती है जिसकी शुरुवात सेनवर्मन से हुई जो चौथी शताब्दी के महाराजा हुए है। यह अभिलेख यदुवंश घराने का काफी प्राचीनतम इतिहास बताता है -











इसमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि राजकुमारी ईश्वरा जी , सिंहपुर के यादव वर्मन राजवंश से संबंध रखती थीं जिस साम्राज्य की शुरुवात में राजा सेनवर्मन (चौथी शताब्दी) को उल्लेख किया गया है और मूल अभिलेख में उनके पूर्वजों को यदुवंश तथा चंद्रवंश से संबंधित बताया गया है। 


अब इसी वर्मन राजवंश की एक शाखा जो बंगाल प्रदेश सहित बिहार के अंग देश सहित और भी कई बंगाल के बाहरी क्षेत्रों पर शासन करती है जिसमें कि हमे आज महाराज भोजवर्मन का अभिलेख प्राप्त होता है , इसमें वर्मन राजवंश को श्री कृष्ण के वंश से संबंधित बताया गया है -










8) Vijaynagar Dynasty (Karnataka)

जब बाहरी आक्रमणों (दिल्ली सल्तनत) के कारण होयसला साम्राज्य कमजोर होकर पतन की ओर बढ़ा, तब उसके बाद 1336 ईस्वी में विजयनगर साम्राज्य का उदय हुआ। इसकी स्थापना दो यादव भाइयों हरिहर राय और बुक्का राय (संगम वंश) ने की थी। सम्राट कृष्णदेवराय विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagara Empire) के सबसे महान राजा थे। उनके शासनकाल (1509–1529 CE) को विजयनगर साम्राज्य का 'Golden Era' कहा जाता हैउनके दरबार में 'अष्टदिग्गज' नाम के आठ प्रसिद्ध विद्वान और कवि रहते थे, जिनमें प्रसिद्ध तेनालीराम भी शामिल थे। प्रसिद्ध वेद भाष्यकार आचार्य सायण भी इन्हीं यदुवंशी राजाओं के प्रधानमंत्री हुए थे ।



Pic : Bronze statues of King Krishnadevaraya and his queen consorts, Chinna Devi and Tirumala Devi, with both queens wearing sacred Yajnopavita (Janeu) threads across their torsos — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम


Bitragunta grant Of Samgama 2 -














Nallur Grant Of Harihar 2 -


















अब एक और जबरदस्त विजयनगर साम्राज्य के महाराज बुक्काराय का ताम्र अभिलेख प्रस्तुत करते है -






यहां इस अभिलेख में गोल्लापुरी नामक स्थान के अधिपति गोपालकृष्ण गवुळू के बारे में उल्लेख मिलता है। अभिलेख के विवरण के अनुसार, गोपालकृष्ण गवुळू यदुवंश से संबंधित थे। उनके तीन पुत्रों का भी उल्लेख किया गया है, जो अपने परिवारों, गौ पशुओं और गाड़ियों के साथ विजयनगर के राजा के पास गए थे। वहाँ उन्होंने राजा को धन भेंट किया और उनसे सम्मान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने किलों एवं मंदिरों के निर्माण तथा कुओं की व्यवस्था जैसे कार्य किए।
इस प्रकार, अभिलेख में गोपालकृष्ण गवुळू का वर्णन गोल्लापुरी के अधिपति और यादव-कुल से संबंधित व्यक्ति के रूप में मिलता है। साथ ही, उनके परिवार और तत्कालीन विजयनगर शासक के साथ उनके संबंधों का भी उल्लेख किया गया है।
संस्कृत का गोपाल शब्द , उत्तर भारतीय शब्द ग्वाला और दक्षिण का गोल्ला - तीनों एक ही अर्थ में विभिन्न भाषाओं के शब्द भेद रूप है। तीनों ही यदुवंशी थे इसका इस अभिलेख से भी पुष्टि होती है।

इसीमे यह भी बताया है कि मैसूर शहर के प्राचीन राजवंशों में यदुवंशियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है ।


वही तमिलनाडु के यादव समुदाय को प्राचीन तमिल साहित्य में मूलत ‘आयर’ (Ayar) कहा गया है अर्थात् अहीर या गोपालक , जबकि स्थानीय रूप से उन्हें ‘इडैयन’ (Idaiyan) नाम से भी जाना जाता है। सरकारी अभिलेखों में भी इस समुदाय का नाम ‘इडैयन’ दर्ज किया जाता था। तमिल भाषा बोलने वाले यादवों को ‘इडैयन’ कहा जाता था, जबकि तेलुगु भाषा बोलने वाले यादवों को ‘गोल्ला’ (Golla) तथा ‘वडुग आयर’ (Vaduga Aayar) नामों से जाना जाता है। मद्रास सरकार के शासनादेश संख्या G.O. No. 5240, Law (General) के अनुसार, सरकारी घोषणाओं में ‘गोल्ला’, ‘इडैयन’, ‘गोला’, ‘गोपी’ और ‘गोड़ा’ नामों के स्थान पर ‘यादव’ नाम अपनाने का निर्णय लिया गया। इसके अतिरिक्त, कुछ यादव समूहों के द्वारका तथा कुमारीकंडम से वर्तमान तमिलनाडु की ओर प्रवास करने की परंपराएँ भी प्रचलित हैं। मुल्लै भूभाग के कुछ प्राचीन राजाओं के अभिलेखों में ‘आय-कुल’ और ‘यादव’ दोनों नामों के उल्लेख का दावा किया गया है। तमिलनाडु में यादव समुदाय के लिए ‘आयर’, ‘इडैयन’, ‘गोल्ला’ और ‘वडुग आयर’ जैसे नामों का प्रयोग ऐतिहासिक एवं भाषायी संदर्भों में मिलता है। मद्रास सरकार के शासनादेश के बाद से सरकारी नामकरण में इन्हें ‘यादव वंश’ में ही गणना किया जाता है।


अब आगे, देवराय द्वितीय के सत्यमंगलम् ताम्र अभिलेख (1424 AD) -













9) Kalachuri Dynasty (Tripuri, Madhya Pradesh)

कलचुरि राजवंश - कलचुरि राजवंश ने लगभग 7वीं से 13वीं शताब्दी ईस्वी के बीच मध्य भारत और दक्कन के विभिन्न क्षेत्रों में काफी लंबा शासन किया। इनका प्रमुख केंद्र त्रिपुरी (जो कि वर्तमान जबलपुर) था, जो चेदि क्षेत्र का महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र बना। कलचुरि शासकों का संबंध ऐतिहासिक ग्रंथों में वर्णित यदुवंश की एक शाखा हैहय वंश से संबंधित हुआ करती थी जिसमें कि भगवान परशुराम के साथ जुड़े कार्तवीर अर्जुन के भी कथाएं मुख्य रूप से प्रसिद्ध है।

कलचुरि साम्राज्य कोई एक अखंड साम्राज्य नहीं था, बल्कि इसकी कई क्षेत्रीय शाखाएँ थीं—त्रिपुरी (चेदि), माहिष्मती, कल्याणी, रतनपुर और सरयू पार। इनमें त्रिपुरी के कलचुरि प्रमुख थे। कोक्कल्ल प्रथम, गांगेयदेव और कर्ण जैसे शासकों ने इस वंश की सत्ता और प्रभाव का विस्तार किया। इतिहास में इनका शासन मंदिरो के निर्माण, धार्मिक संरक्षण, प्रशासन और पराक्रमी सैन्य अभियानों के लिए जाना जाता रहा है।



अब देखिए इनकी उत्पत्ति किस प्रकार चन्द्रवंश में हैहय वंश से हुई थी इसके प्रमाण / साक्ष्य।

जबलपुर से प्राप्त महाराजा यशःकर्णदेव के ताम्र अभिलेख -









इसप्रकार यदुवंश के इस प्रतापी साम्राज्य त्रिपुरी के कलचुरि-चेदि (हैहय) राजवंश ने लगभग 675 ईस्वी से 1212 ईस्वी तक, करीब 537 वर्षों तक शासन किया। आप विचार कर सकते है इतिहास में इनका क्या प्रभाव रहा होगा। इनकी मूल रूप से राजधानी त्रिपुरी (वर्तमान जबलपुर, मध्य प्रदेश) रही।

इस वंश के राजाओं के नाम और शासनकाल कुछ इसप्रकार है:-

 वामराजदेव (675–700 ई.), 
 शंकरगण प्रथम (लगभग 750 ई.),
 लक्ष्मणराज प्रथम (लगभग 825–850 ई.),
 कोक्कल्ल प्रथम (850–890 ई.),
 शंकरगण द्वितीय / मुग्धतुंग (890–910 ई.),
 बालहर्ष (910–915 ई.),
 युवराजदेव प्रथम (915–945 ई.),
 लक्ष्मणराज द्वितीय (945–970 ई.),
 शंकरगण तृतीय (970–980 ई.),
 युवराजदेव द्वितीय (980–990 ई.),
 कोक्कल्ल द्वितीय (990–1015 ई.),
 गांगेयदेव (1015–1041 ई.),
 लक्ष्मीकर्ण / कर्णदेव (1041–1073 ई.),
 यशःकर्ण देव (1073–1123 ई.),
 गयाकर्ण (1123–1153 ई.),
 नरसिंहदेव (1153–1163 ई.),
 जयसिंहदेव (1163–1188 ई.),
 विजयसिंहदेव (लगभग 1188–1210 ई.),
 त्रैलोक्यमल्ल (12वीं शताब्दी के अंतिम चरण से 1212 ई. के बाद तक के इनके अभिलेखीय संदर्भ मिलते है)

10) मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के शासक राजा आशा अहीर का राजवंश 

असीरगढ़ का रहस्यमयी किला : राजा असा अहीर (Asa Ahir) मध्यकालीन भारत के खानदेश क्षेत्र (वर्तमान बुरहानपुर, मध्य प्रदेश) के एक स्थानीय अहीर (यादव) शासक थे। फ़रिश्ता के लिखे इतिहास अनुसार राजा आसा अहीर ने इस असीरगढ़ के किले को 1370 ई. में सुरक्षा घेराव मजबूत किया था। यह किला उनसे प्राचीन है क्योंकि फरिश्ता में साफ तौर पर लिखा हुआ है की इस क्षेत्र पर राजा आसा अहीर के पूर्वजों ने 700 वर्ष तक उनसे पूर्व से राजशासन चला रहे थे अनुमान कर सकते है न जाने कितने शासक होंगे असीरगढ़ के इस राज्य पर । अहीर शासकों का इस स्थल से नाता काफी पुराना रहा है । यह किला मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से लगभग 20–25 किलोमीटर दूर सतपुड़ा पर्वतमाला में स्थित एक ऐतिहासिक दुर्ग है। इसे इसकी अभेद्य स्थिति और सामरिक महत्त्व के कारण ‘हिंदुस्तान का जिब्राल्टर’ तथा दक्षिण भारत के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है। दंत कथाओं में locals का ऐसा मानना है इसी स्थल पर महाभारत का योद्धा अश्वत्थामा ने शरण ग्रहण किया था। 






अब मध्यप्रदेश का जिक्र हो रहा हो और महोबा की धरती के दो वीर अहीर लाल का वर्णन न हो ऐसा कैसे हो सकता है !

यदुवंशी बनाफर वंश में प्रतापी क्षत्रिय आल्हा और ऊदल का जन्म होता है। ‘आल्हखंड’ काव्य के अनुसार, आल्हा और ऊदल ने अपने जीवनकाल में कुल 52 युद्ध लड़े थे और वे उनमें अजय रहे । इनके वीरता और यश गाथाओं का प्रभाव मध्यप्रदेश की धरती से दिल्ली तक पहुंचा , ऐसा कि स्वयं चंदबरदाई ने अपने "पृथ्वीराज रासो" नामक पुस्तक में ३६ क्षत्रिय कुलों में अभीर कुल को भी सम्मिलित कर लिया। मूल रूप से आल्हा ऊदल बनाफर यदुवंशी अहीर थे । ये दोनों चंदेल राजा परमर्दिदेव (राजा परमाल) के सेनापति थे। वे दोनों बुंदेलखंड क्षेत्र (विशेषकर महोबा राज्य) के महायोद्धा थे। महोबा के ऐतिहासिक परंपराओं और लोक मान्यताओं के अनुसार, बनाफर वंश के कुलगुरु गोरखनाथ थे, जो कि अहीर मूल के माने जाते हैं। अब इसका इतिहास पुराणों से देखे -






पुराणों में आल्हा ऊदल की दादी अहीर कही गई और पिता एवं माता भी अहीर समुदाय से संबंधित बताया गया है।





यहां इन पृष्ठों में आल्हा ऊदल की बहन चंद्रावली का विवाह एक यादव राजा से किए जाने की बात चल रही है। इससे एक बात तो स्पष्ट है अहीर ही यादव होते है पुराणों के अनुसार और वे बनाफर यदुवंशी तो थे ही। इसमें कुछ मूल आल्हा खंड से प्रमाण देते है (सेव कर लेवे) -


आप पढ़ सकते है इसमें की वीर अहीर आल्हा देव के पिता बनाफर राय (यदुवंशी) थे । उनकी माता भी अहिरिनि थी उनकी , इसमें इनके पिता क्षत्रिय वर्ण थे , इसमें हम आपको आगे नीचे प्रमाण देने वाले है इनको सर्वत्र बनाफर अभीर क्षत्रिय लिखा है।  

अब देखिये यहां ऊदल को क्षत्रिय अहीर से तुलना किया हुआ है

अब आपको वो प्रमाण देंगे जिससे निर्विवाद सिद्ध हो जाएगा ऊदल मलखान को और समस्त बनाफर क्षत्रियों को अभीर क्षत्रिय सेना लिखा गया है देखे प्रमाण -







अतः इन प्रमाणों से ये सिद्ध हुआ बनाफर सेना अभीर क्षत्रिय यदुवंशी सेना थी , कुछ जगह क्षत्रिय की जगह ठाकुर शब्द भी इनके लिए किया हुआ है ये भी प्रकार की एक पदवी थी बनाफर अभीर क्षत्रियों की ।

अब अंग्रेजों की किताब से आधारसंस्थिति से कुछ उद्धरण -

The Tribes and Castes of the North-western Provinces and Oudh By William Crooke 1896


अब देखे 1826 में ब्रिटिशर्स के रिकॉर्ड में बुंदेलखंड की भूमि सर्वेक्षण में यदुवंशी अहीर शब्द प्राप्त हुआ । ये जानकारी बेहद एहम है क्योंकि कुछ लोगों का कहना है अहीरों ने यदुवंशी नाम 1914 के पश्चात से लगाना आरम्भ किया। ये अंग्रेजों की लन्दन से छपी रिकॉर्ड है जिसमें बनाफर को उल्टा निम्न कॉस्ट में उस समय पाया गया साथ में कुछ अहीर भी है वह वर्ण भेद था कॉस्ट सिस्टम का अन्यथा बनाफर वर्ग और अहीर वर्ग महोबा के क्षत्रिय माने जाते थे राजा पृथ्वीराज के काल में। 


विष्णुपुराण मध्यप्रदेश में नर्मदा तट के किनारे अभीरो का राज्य वर्णन करता है - 



अंतिम तथ्य - एक प्राचीन अभिलेख में अभीरो के ग्राम को ‘अभीर पल्ली’ (जिसको संस्कृत साहित्यों में घोष अथवा घोषा शब्द से लिखा गया है ; और हरिवंश महाभारत आदि में गोप क्षेत्र वा ब्रज क्षेत्र का सामान अर्थ) नाम से उल्लेख हुआ है -






अब आपका काम है इस सत्य से पुष्ट यदुवंश के इतिहास के शोध - प्रमाणों को हर यदुवंशी बंधुओं तक पहुंचाना । अधिक से अधिक शेयर करिए । साथ ही हम यह सारे प्रमाण किसी भी प्रकार के जातिवाद संबंधी गतिविधियों के समर्थन हेतु नहीं दे रहे । यह शुद्ध इतिहासात्मक हमारा लेख आपसमें एक दूसरों के साथ लड़ाई करने हेतु भी नहीं दिया जा रहा , किन्तु जहां भी यदुवंशी समाज पर झूठे आक्षेप किये जाए उनके इतिहास के विषय में झूठ परोसा जाए , उस समय इन प्रमाणों के माध्यम से प्रीतिपूर्वक उत्तर देने , सभ्य भाषा में संवाद चर्चा शास्त्रार्थ करने , और बिना उच्च नीच का भेद उत्पन्न किए स्थितियों के समर्थन करते है । हम समस्त भारतवासियों की एकता एवं अखंडता बनाए रखने के पक्षधर है आशा करता हु ये जानकारी आपको पसंद आएगी इसे शेयर अवश्य करे अस्तु । सादर नमस्ते जी धन्यवाद । 🙏🌹🌹










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