YADAVA DYNASTIES: TRACING THEIR HISTORY THROUGH INSCRIPTIONS
YADAVA DYNASTIES: TRACING THEIR HISTORY THROUGH INSCRIPTIONS
— Raj Arya
1) Abhira Dynasty (Maharashtra)
यहां अभिलेख में राजा ईश्वरसेन को पिता के नाम से पूर्व उनके माता जी के नाम से पहचान लिखी गई है । पूर्व काल में केवल आर्यावर्त के राजाओं में ही माता के नाम से भी पुत्र की प्रसिद्धि होने की सुंदर प्रथा हुआ करती थी , (उदाहरण- कुंतीपुत्र अर्जुन , देवकीनंदन कृष्ण , राधेय कर्ण , गंगापुत्र भीष्म आदि) जो की आज बदलकर केवल पिता के नाम के साथ सीमित हो गई है ।
Gunda Inscription Of Abhira Rudrabhuti-
2) Traikutaka Dynasty (Maharashtra)
आप देख सकते है इन राजाओं ने अपने राजकीय सिक्कों पर परम वैष्णव अंकन करवाया हुआ है। पुराणों में वैष्णव को कृष्ण से उत्पन्न कहा गया है , विचार कर सकते है जिस काल में कृष्ण के वंशजों या वैष्णव /भागवत ने ये प्रसिद्ध किया था उसी काल में अभीर राजा इस सर्वोच्च उपाधि को धारण कर रहे होंगे।
3) Abhira Gupta Dynasty (Nepal)
Partition से पूर्व भारत के नेपाल क्षेत्र में प्रारंभिक लिच्छवी काल के दौरान, आभीर ( अहीर या यादव ), जो पांचवीं शताब्दी ईस्वी से पहले उत्तरी भारत के मथुरा क्षेत्र से चलकर नेपाल में बसे थे , प्रशासन में लगातार बढ़ते पद पर आसीन होते गए । इन्होंने स्वयं अपनी dynasty चलाई अभिर -गुप्त राजवंश एक ऐसा राजवंश था, जिसके बारे में माना जाता है कि यह आधुनिक नेपाल में काठमांडू घाटी में अस्तित्व में था । इनका राजवंश काफी लंबे समय तक नेपाल पर राज करता रहा।
इनमें अभीर गुप्त वंश के कुछ शासकों में नाम शामिल हैं:रविगुप्त (532 ईस्वी)भौमगुप्त (567–590 ईस्वी)जिष्णुगुप्त (624–637 ईस्वी)विष्णुगुप्त (638–643 ईस्वी)
राजा जिष्णुगुप्त के ठानकोट अभिलेख में स्पष्ट रूप से आप देख सकते है गोमिन = गोप = चंद्रवंशी एक साथ आया हुआ है। अर्थात् अभीर और गोप चंद्रवंशी क्षत्रिय एवं राजा होते है, देखे पाठक गण -
यहां मानगुप्त गोमिन् को राजा जिष्णुगुप्त के प्रपितामह (परदादा) के रूप में बताया गया हैं। उन्होंने एक जलाशय बनवाया था। शुरुवाती पंक्तियों में ‘गोप’ शब्द भी लिखा हुआ है लेकिन किसको कहा जा रहा है ये पंक्तियां क्षतिग्रस्त होने से अस्पष्ट है , इसलिए हम कोई दावा नहीं करेंगे इसपे । परंतु इस शिलालेख से हमे यह ज्ञात हुआ कि ये वंश गोमिन समुदाय से संबंधित था।
अब अभीर गुप्त राजवंश के इतिहास पर एक और महत्वपूर्ण प्राचीन अभिलेख प्रस्तुत है इसे भी पढ़े । नेपाल के काठमांडू में स्थित प्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ मंदिर के प्रांगण में शिवलिंग की पीठिका पर यह अभिलेख उत्कीर्ण है -
इस अभिलेख में स्पष्ट रूप से अभीर = गोमिन = गोप सिद्ध होता है देखे -इस अभिलेख में एक आभीरी जो गोमिनी पहचान से वर्णित है जिसने अपने दिवंगत पति के पुण्य की वृद्धि के लिए अनुपरमेश्वर शिवलिंग स्थापित करवाया था। यह उसके पति की स्मृति और उनके परलोक-कल्याण से जुड़ा धार्मिक कार्य था। इस अभिलेख से पता चलता है उल्लेखित आभीरी गोमिनी जो स्त्री यहां वर्णित है वह परमाभिमानी (परमगुप्त) के पुत्र की पत्नी थी और उसके संतानों में भौमगुप्त का नाम उल्लेखित किया गया है। पूर्वोक्त ठाँकोट अभिलेख में जिष्णुगुप्त अपने प्रपितामह मानगुप्त गोमीन का उल्लेख करता है। विद्वानों ने भौमगुप्त गोमिन को जिष्णुगुप्त के दादा के रूप में माना है ।
अब देखे चौथी शताब्दी के प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ अमरकोश में "गोमिन" शब्द का अर्थ गायों का स्वामी या पालक ही बताया गया है जिस पदवी से नेपाल का यह अभीर गुप्त राजवंश प्रसिद्ध हुआ है(यह कोश इन्हें वैश्य वर्ग में रखता है) -
अब देखे , नेपाल में एक प्रसिद्ध कैलाशकूट राजभवन हुआ करता था जिसका निर्माण अंशुवर्मा ने करवाया था।। अंशुवर्मा के बाद में , आभीर-गुप्त राजवंश (जिन्हें इतिहास में केवल गुप्त या महिषपाल/अहीर वंश भी कहा गया) के वास्तविक शासक जिष्णु गुप्त ने नेपाल की वास्तविक प्रशासनिक सत्ता अपने हाथों में ले ली। नेपाल के प्राचीन इतिहास में प्रसिद्ध कैलाशकूट भवन में मुख्य रूप से आभीर-गुप्त वंश के शक्तिशाली शासक जिष्णुगुप्त और उनके पुत्र विष्णु गुप्त रहते थे। जिसका वर्णन चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपने भारत के यात्रा वृतांत में किया हुआ है ।
अब देखे , इसी राजभवन से जुड़ी जानकारियों के विषय में हमे काठमांडू के नक्साल क्षेत्र में स्थित नारायणचौर से जयदेव द्वितीय (713–733 ई.) का एक अभिलेख प्राप्त होता है। यह नारायणचौर अभिलेख अभीर राजा जिष्णुगुप्त और विष्णुगुप्त दोनों के बाद के समय का माना जाता है।

चित्र : ५१वे पंक्ति स्पष्ट रूप से जिष्णुगुप्त के राजभवन में
‘यदु द्वार’ का वर्णन अर्थात् यदु के नाम से जाना जाता था

आप देख सकते है इस राजभवन के वास्तु नक्शे पर किस प्रकार द्वार का नाम जिष्णुगुप्त और विष्णुगुप्त अभीर राजाओं ने अपने काल में यदु के नाम से प्रसिद्ध किया। जिसका अभी हमने ऊपर जयदेव द्वितीय के शिलालेख में भी वर्णन देखा । इससे एक बात तो यहां स्पष्ट हुआ नेपाल का अभीर गुप्त राजवंश चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश , गोमिन वंश (अर्थात् गोपवंशी) , अभीर वंश और यदुवंशी नामों से प्रसिद्ध था । यानी अब तक क्या सिद्ध हुआ ? अभीर = गोप = चंद्रवंशी क्षत्रिय = यदुवंशी ।
आगे कुछ नेपाल के सरकारी रिकॉर्ड्स एवं शोधों से कुछ जानकारियां संलग्न करते है —
4) Chudasama Abhir Dynasty (Gujrat)
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| चित्र : ५१वे पंक्ति स्पष्ट रूप से जिष्णुगुप्त के राजभवन में ‘यदु द्वार’ का वर्णन अर्थात् यदु के नाम से जाना जाता था |

चूड़ासमा आभीर राजवंश गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में शासन करने वाला एक प्रमुख राजवंश था। इसकी सत्ता का प्रमुख केंद्र गिरनार और जूनागढ़ के आसपास था। इस राजवंश के शासकों का इतिहास वंथली, जूनागढ़ और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। इनके शासनकाल को सामान्यतः मध्यकाल से जोड़ा जाता है, विशेषकर लगभग 9वीं–15वीं शताब्दी के बीच।
फिर हमे गिरनार के अभिलेखों में इस राजवंश की विस्तृत वंशावली मिलती है जो सीधे महाराज यदु से कृष्ण से चलती हुई आई है और मजे की बात है ये वंश अभीर है । वंथली और चोरवाड़ में प्राप्त अभिलेख भी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि चूड़ासमा राजवंश की उत्पत्ति यदुवंशी क्षत्रिय परंपरा से जुड़ी थी। इस राजवंश के शासक अपने नामों के साथ प्रायः ‘राणा’ और ‘महाराणा’ जैसी उपाधियों का प्रयोग करते थे -
5) Seuna Dynasty (Yadavas of Devgiri, Maharashtra)
देवगिरी के सेउना यादव वंश : मध्यकालीन महाराष्ट्र का महान राजवंश । दक्कन में जन्मे सेउनदेव यादव (लगभग 850 — 1317) की शुरुआत मामूली थी। उनकी शुरुआत कन्नड़ बोलने वाले दक्कन में हुई थी , जहाँ उन्होंने सबसे पहले महाराष्ट्र में आज के नासिक के पास सिन्नर में अपनी सत्ता की जगह बनाई थी । लेकिन किस्मत में कुछ और ही लिखा था — वे मिडिल एज इंडिया के सबसे ताकतवर वंशों में से एक बनने वाले थे।
9वीं सदी के आखिर तक , सेऊना राष्ट्रकूटों के सामंतों के तौर पर उभरे , और बाद में पश्चिमी चालुक्यों के साथ मिल गए । समय के साथ, उन्होंने अपनी आज़ादी का दावा किया, खासकर भीलमा V के राज में, जिन्होंने लगभग 1187 CE में राजधानी को देवगिरी (आज का दौलताबाद) में शिफ्ट कर दिया । सभी को विदित हो की इसी वंश में आगे चलकर मराठा साम्राज्य के महानायक छत्रपति शिवाजी महाराज की माता श्री जीजाबाई ने जन्म लिया था । शिवराय को हिंदुत्व के लिए लड़ने और शौर्य का सारा शिक्षण देने वाली राजमाता श्री जीजाबाई का जन्म यदुवंश घराना में ही हुआ था । ऐसे वीरोत्तम कुलधर्म को कोटि कोटि नमन है जहां माता जीजाबाई जैसी वीरांगनाएं निकलती हो (आजकल कुछ हिन्दू इन देवगिरि के यादवों का अपमान करते हुए मिल जाएंगे , उन मूर्खो को हिंदू किस हेतु से माना जाए ?)
चित्र : सेउना यादवों की राजधानी देवगिरी का किला — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम
गडग अभिलेख, यादव राजा भिल्लम — शक संवत् 1113 (1191 ईस्वी) -
कर्नाटक के गडग स्थित त्रिकूटेश्वर (शिव) मंदिर के पत्थर पर उत्कीर्ण यह संस्कृत अभिलेख नागरी लिपि में लिखा गया है। इसमें यादव वंश की वंशावली देते हुए राजा सेउनदेव, मल्लुगीदेव, कर्णदेव और भिल्लमदेव का उल्लेख मिलता है जो इस साम्राज्य के संस्थापक माने जाते है । अभिलेख में यादवों को राजर्षि यदु के कुल से उत्पन्न बताया गया है। इसमें राजा भिल्लम के शासनकाल में धार्मिक दान के अंतर्गत एक गाँव की भूमि त्रिकूटेश्वर मंदिर को दिए जाने का भी वर्णन है। देखे अभिलेख -
अब इन देवगिरि के यादवों के विषय में बॉम्बे गजेटियर से हमे ज्ञात होता है कि ये महाराष्ट्रीय मूल के अभीर गवली राजाओं के ही एक शाखा थे । होंगे भी क्यों न इन्होंने अपने वंश को श्री कृष्ण से बताया है वे गोप थे , उनके पिताश्री वसुदेव जी गोप थे हरिवंश पुराण अनुसार इसी कारण हमें 96 मराठा कुलों में अहिरराव और यादव जैसे उपनाम भी मिलते हैं। अतः मूलरूप से उनके वंशज अभीर/गवली वंश लगा सकते है -
अंबे जोगाई के यादव अभिलेख: इस अभिलेख में शक्तिशाली आभीर राजा लक्ष्मीदेव से संबंधित युद्ध का वर्णन मिलता है। राजा लक्ष्मीदेव ने सिंघणदेव की विजय से पहले खानदेश (भाम्भागिरी) पर शासन किया था , अनेक विद्वानों ने अनुमान से इन दोनों को एक ही मूल का बताया है -
अब कुछ लोग कहेंगे सेउना के सिंघनदेव का युद्ध लक्ष्मीदेव अभीर से हुआ इसलिए ये दोनों शायद अलग होंगे । ऐसे ही लोगों को इतिहास की समझ नहीं होती क्योंकि युद्ध कभी वंश या race देखकर नहीं हुआ करती । राजाओं के युद्ध का सदैव कारण राज्य का विस्तार , उच्च राज्यपद या सत्ता प्राप्त करना , शक्तिसंपन्न बनने का स्वार्थ , शक्तिप्रदर्शन दिखा अपने शासन अधिपत्य स्थापना आदि कारणों एवं लाभ / हानि नीतियों के तहत ही होता हुआ आया है न की racism इसका मुख्य कारण होता है । इन कारणों के उपस्थित होने पर राजा सामने यदि स्वयं का कुल ही क्यों न हो उनसे युद्ध कर लेते थे । पूर्वकाल में कौरव पांडव के बीच हुए महाभारत युद्ध को ही देखे , क्या आपके इसी तर्क से वे भी अलग अलग वंश के हो जाएंगे या एक ही वंश के भाई कहलाएंगे ? आगे इस तरह के कुछ उदाहरण हम नीचे भी दे रहे है -
देवगिरी का सेउना यादवो का होयसाल यदुवंशियों से युद्ध :
होयसाल साम्राज्य (कर्नाटक) का सबसे लंबा और ऐतिहासिक संघर्ष देवगिरी के सेउना यादवों (महाराष्ट्र) के साथ हुआ।• दोनों ही राजवंश खुद को यदुकुल का बताते थे, लेकिन उपजाऊ कृष्णा-तुंगभद्रा दोआब क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए इनके बीच लगभग 124 वर्षों (1187-1311 ईस्वी) तक निरंतर युद्ध चला।
• होयसल राजा वीर बल्लाल द्वितीय का देवगिरी के यादव सम्राट भीलम पंचम के साथ प्रसिद्ध 'सोरातुर का युद्ध' (1189 ईस्वी) हुआ था, जिसमें होयसलों की जीत हुई। बाद में देवगिरी के प्रतापी राजा सिंहन द्वितीय ने होयसलों को हराकर उत्तरी क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर लिया था।
इसी तरह विजयनगर साम्राज्य के यादवों का भी अन्य यादवों से युद्ध इतिहास में दर्ज है -
• गोल्ला यादव/कंबलम नायक (आंध्र और तेलंगाना के स्थानीय यादव शासक): विजयनगर के शुरुआती दौर में कृष्णा और गोदावरी डेल्टा के क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय गोल्ला यादव नायकों और सरदारों के साथ उनके सीमाई संघर्ष और बाद में रणनीतिक गठबंधन हुए।
• कलक्काड के चेरा/यादव राजा (तमिलनाडु-केरल सीमा): विजयनगर साम्राज्य के विस्तार के दौरान (विशेषकर राजा कृष्णदेवराय के समय), दक्षिण के स्थानीय राजवंशों और वेनाड (त्रावणकोर) के शासकों, जिन्हें कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में स्थानीय यादव (जयासिम्हा वंश) शाखाओं से जोड़कर देखा जाता है, के विद्रोहों को दबाने के लिए विजयनगर की सेनाओं ने युद्ध लड़े थे।
क्या इन लड़ाइयों का भी ये निष्कर्ष निकाल सकते है की यहां कोई कुलभेद था इसलिए लड़ाइयाँ लड़ी जा रही थी ? वंशभेद का जब अभिलेखों पर किसी राजा ने जिक्र ही नहीं है तो क्यों ऐसे मनमाने फर्जी अनुमान किए जाते है। कहा लिखा हुआ है हम यदुवंशी है तुम नहीं हो इसलिए तुमसे युद्ध हो रहा है ? ये तो बड़ा ही हास्यास्पद कुतर्क है इन लोगों का।
6) Hoysala Dynasty (Karnataka)
चित्र : होयसला राजवंश के कर्नाटक के बेलूर (Belur) स्थित चेन्नाकेशव मंदिर (Chennakeshava Temple) में प्रसिद्ध मदनिका (नर्तकी अप्सरा) — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम
होयसल वंश का यदुवंशी होने का अभिलेख (प्रमाण) -
7) Yadava-Varman Dynasty (Uttarakhand & Bengal)
8) Vijaynagar Dynasty (Karnataka)
Pic : Bronze statues of King Krishnadevaraya and his queen consorts, Chinna Devi and Tirumala Devi, with both queens wearing sacred Yajnopavita (Janeu) threads across their torsos — इमेज सौजन्य: CC के तहत अपना काम
Bitragunta grant Of Samgama 2 -
Nallur Grant Of Harihar 2 -
अब एक और जबरदस्त विजयनगर साम्राज्य के महाराज बुक्काराय का ताम्र अभिलेख प्रस्तुत करते है -
9) Kalachuri Dynasty (Tripuri, Madhya Pradesh)
जबलपुर से प्राप्त महाराजा यशःकर्णदेव के ताम्र अभिलेख -
10) मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के शासक राजा आशा अहीर का राजवंश
अब मध्यप्रदेश का जिक्र हो रहा हो और महोबा की धरती के दो वीर अहीर लाल का वर्णन न हो ऐसा कैसे हो सकता है !
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| The Tribes and Castes of the North-western Provinces and Oudh By William Crooke 1896 |















































































































































































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