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1911 में नोबेल पुरस्कार विजेता पाश्चात्य विद्वान् Maurice Maeterlinck का वेदों के प्रति विचार

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  नमस्ते आर्य मित्रों 🙏 { Our YouTube channel link For more - https://youtu.be/RbVYcD7m55I } आज आपके ज्ञान में वर्धन हेतु एक छोटा सा लेख प्रस्तुत है , पाश्चात्य विद्वान “ Maurice Polydore Marie Bernard Maeterlinck” , १९११ के नोबेल पुरुस्कार विजेता के पुस्तक “The Secret”  इसमें से कुछ आवश्यक तथ्य आपके पठनार्थ हम उद्धृत कर रहे है जिससे वेदनिंदकों के नेत्र खुलें- मैटरलिंक अपने पुस्तक के Pg. 3 पर यह लिखते हैं आज किसी के द्वारा हिंदुओ की अति प्राचीन उद्गम इतिहास का पता नही किया जा सकता - From the historical point of view we have absolutely no documents whatever if we go back a greater distance than five, or six, or perhaps seven thousand years. We cannot tell how the religion of the Hindus and Egyptians came into being. When we become aware of it we find it already complete in its broad out lines, its main principles. आगे Pg.8 पर वे वेदों की प्रशंसा में रूडोल्फ स्टेनर की सम्मति उद्धृत करते हुए लिखते है - What we read in the ‘Vedas,’ “says Rudolph Steiner, one of the most scholar...

क्या कुंताप सूक्त को ऋषि दयानंद ने मिलावट कहा?

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लेखक - यशपाल और राज आर्य  अथर्ववेद के 20वें काण्ड के सूक्त 127 से 136 सूक्त पर्यन्त 10 सूक्तों को कुंताप सूक्त कहा जाता है। इन सूक्तों के ऊपर हम आज विचार करेंगे। सर्वप्रथम हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि चारों वेद सृष्टि के आदि में ४ ऋषियों को प्राप्त होते हैं तथा वेद ही सब सत्य विद्याओं का ग्रंथ हैं इसी मत को प्रतिपादित करते हुए ऋषि दयानंद इस्लाम मत की समीक्षा जो लिखते हैं - “और जो बाइबल इञ्जील आदि पर विश्वास करना योग्य है तो मुसलमान इञ्जील आदि पर ईमान जैसा कुरान पर है वैसा क्यों नहीं लाते? और जो लाते हैं तो कुरान १ का होना किसलिये? जो कहें कि कुरान में अधिक बातें हैं तो पहली किताब में लिखना खुदा भूल गया होगा! और जो नहीं भूला तो कुरान का बनाना निष्प्रयोजन है। और हम देखते हैं तो बाइबल और कुरान की बातें कोई-कोई न मिलती होंगी नहीं तो सब मिलती हैं। एक ही पुस्तक जैसा कि वेद है क्यों न बनाया?” तथा इसी प्रकार अन्यत्र देखें- “जो मूसा को किताब दी थी तो पुनः कुरान का देना क्या आवश्यक था? क्योंकि जो भलाई बुराई करने न करने का उपदेश सर्वत्र एक सा हो तो पुनः भिन्न-भिन्न पुस्तक करने से पुनरुक्त ...

यजुर्वेद में बकरे के दूध का भ्रान्ति निवारण

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  कुछ लोग ऐसा दावा करते हैं कि महर्षि दयानंद जी ने वेद भाष्य में लिखा है कि बकरे का दूध पियो। हम इस लेख में इसी आक्षेप का निवारण करेंगे। किंतु सर्वप्रथम हम यह स्पष्ट कर दें कि महर्षि का केवल संस्कृत भाष्य ही है, भाषा भाष्य ऋषि का नहीं है। भाषानुवाद पंडितों का है। हम अपनी बात को पुष्ट करने हेतु कुछ प्रमाण उद्धृत करते हैं- महर्षि दयानन्द का जीवन चरित भाग 2 [लेखक - देवेंद्र नाथ जी मुखोपाध्याय] जीवनचरित महर्षि स्वामी दयायन्द सरस्वती [लेखक - पण्डित लेखराम जी] अतः हम महर्षि दयानन्द कृत संस्कृत भाष्य पर ही विचार करेंगे। आप इस मंत्र के ऋषि के भाष्य को देखेंगे तो ऋषि समयाभाव के कारण छागस्य पद का अर्थ किए बिना ही छोड़ कर आगे बढ़ गए क्योंकि उन्होंने पहले ही इस पद का अर्थ किया था इसलिए उन्हें लगा कि भाषानुवाद करने वाले पंडित इसका भाषार्थ में सही अर्थ कर देंगे किन्तु उन लोगों ने अर्थ का अनर्थ कर दिया। इसका सही अर्थ जानने हेतु हम सर्वप्रथम छाग शब्द का वेद भाष्य में महर्षि दयानंद जी द्वारा किए हुए कुछ अर्थ उद्धृत करते हैं- १. छागस्य = अजादेः (यजुर्वेद २१.४१) २. छागेन = अजादिदुग्धेन (यजुर्वेद १९.८...

क्या अर्जुन सुभद्रा तथा कृष्ण रुक्मणि भाई बहन लगते थे?

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कुछ लोग यह आक्षेप लगाते हैं कि सनातन धर्म में निकट संबंधों में विवाह होता था। वे लोग ऐसा आक्षेप करते हैं कि अर्जुन ने सुभद्रा से विवाह किया और सुभद्रा तो कृष्ण जी की बहन थी और और कृष्ण जी के पिता का नाम वसुदेव था, वसुदेव जी के पिता का नाम शूरसेन था और कुंती भी उन्हीं की पुत्री थी जिसे उन्होंने राजा कुंतीभोज को दे दिया और अर्जुन का कुंती पुत्र होने से अर्जुन और सुभद्रा भाई बहन सिद्ध हुए। हम आज इसी आक्षेप का निवारण करेंगे तथा कुछ लोग रुक्मणि और कृष्ण को भी भाई बहन मानते हैं उनका भी भ्रांति निवारण करेंगे। सबसे पहले हम सुभद्राहरण प्रसंग पर थोड़ा संक्षेप से देखते हैं- एक बार रैवतक पर्वत पर वृष्णि व अंधक वंश के लोग एक उत्सव करते हैं। उसमें द्वारका के सैकड़ों हजारों मनुष्य अपनी स्त्रियों व सेवकों सहित पैदल वा छोटी बड़ी सवारियों से आकर सम्मिलित हुए। जिसमें भगवान् श्री कृष्ण जी भी अर्जुन के साथ घूम रहे थे- चित्रकौतूहले तस्मिन् वर्तमाने महाद्भुते। वासुदेवश्च पार्थश्च सहितौ परिजग्मतुः॥१३।। उस अत्यन्त अद्भुत विचित्र कौतूहलपूर्ण उत्सव में भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ घूम रहे थे। टिप्पणी- Criti...

कौन कहता है रामायण में मांसाहार है?

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आपने देखा होगा कि कुछ लोग रामायण में मांसाहार का दोष लगाते हैं और यह कहते हैं कि आर्य लोग मांस भक्षण करते थे, भगवान् राम तो मांसाहारी थे। आज हम इस लेख में इसी मत की समीक्षा करेंगे और जानेंगे कि ऐसे आरोप लगाने वाले लोगों को संस्कृत व रामायण का ज्ञान कितना है। प्रथम आक्षेप- जब भगवान् राम वनगमन की सूचना कौशल्या जी को दे रहे होते हैं तो वे कौशल्या जी से इस प्रकार कहते हैं- वा. रा. अयो.  का.स. २० इसके अनुवादक द्वारकाप्रसाद शर्मा हैं। अब अनुवादक की शास्त्र ज्ञान शून्यता के कारण पूर्वपक्षी इसपर आक्षेप लगाता है कि राम जी कह रहे हैं कि मैं मांसादि को छोड़ कर कंद मूल आदि का भोजन करूंगा, अर्थात् अर्थापत्ति प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि राम जी अयोध्या के राजमहल में मांस भक्षण करते थे। समीक्षा - यहां संस्कृत में आमिषम् शब्द आया है, जिसका गलत अर्थ कर के रामायण में मांसाहार मान लिया गया है। वस्तुतः आमिषम् का अर्थ मांस भी होता है किंतु मन को प्रिय लगने वाले आदि अर्थ भी होते हैं। देखें आप्टे कोश- बिना प्रसंग को देखे मांसाहार का अर्थ मानना रामायण के साथ आपकी मनमानी मात्र है। जब भगवान् राम को देवर्षि...