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Showing posts from November, 2022

क्या ऋषि दयानंद मूर्ति विरोधी थे?

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आज लोगों में ऐसी भ्रान्ति हो गई है कि ऋषि दयानन्द मूर्ति भंजक थे, वे मूर्तियों को तोड़ने में विश्वास रखते थे आदि। समाज में इस प्रकार के अनेक मिथ्या बातें ऋषि दयानंद को बदनाम करने के लिए प्रचारित की जाती हैं। अतः हमें इन भ्रांतियों का निवारण व सत्य का प्रकाश करना आवश्यक जान पड़ा। ऋषि दयानन्द ने मूर्तिपूजा का खंडन किया था क्योंकि लोग मूर्तियों को ईश्वर मान कर उनसे चेतनवत व्यवहार करते हैं, प्राण प्रतिष्ठा इत्यादि अनेक तर्क प्रमाण विरुद्ध कार्य करते हैं, मूर्तियों के नाम पर भोले भाले लोगों से धन लेते हैं। लेकिन ऋषि ने कहीं भी ऐसा नहीं कहा कि मूर्ति बनाना गलत है या मूर्तियों को रखना पाप है। जो लोग कहते हैं कि ऋषि दयानन्द मूर्ति भंजक थे, उनके लिए हम देवेन्द्र नाथ मुखोपाध्याय जी कृत महर्षि दयानन्द का जीवन चरित से प्रमाण देते हैं - देवेन्द्र नाथ मुखोपाध्याय कृत महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित भाग 2 Pg. 579 (संवत् 1990 में आर्य साहित्य प्रचार मंडल लिमिटेड अजमेर से प्रकाशित) यहां आप देख सकते हैं कि जब मूर्ति को हटाने के लिए ऋषि से कहा गया तो ऋषि स्पष्ट कहते हैं कि मेरा उद्देश्य लोगों के मन म...

भगवान् श्रीराम पर विकास दिव्यकीर्ति द्वारा लगाए गए आक्षपों की समीक्षा

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हमें विदित हुआ कि विकास दिव्यकीर्ति ने भगवान राम के ऊपर आक्षेप लगाया। वे भागवान् राम पर आक्षेप लगाते हुए कहते हैं कि उन्होंने माता सीता के लिए बोला कि हे सीता! मेरे लिए तुम वैसी ही त्याज्य हो, जैसे कुत्ते के द्वारा चाट लेने पर हविष्य का उपयोग नहीं किया जाता। इसके साथ ही संबूक वध पर भी आक्षेप लगाया है। सत्य के निर्णयार्थ हम इस विषय पर संक्षिप्त समीक्षा करेंगे। यहां जो कुत्ते के द्वारा चाटे गए हविष्य से तुलना की गई है, इसे प्रसंग को देख कर ही इस श्लोक का वास्तविक अर्थ समझ में आएगा। हम सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण से ही देखते हैं, तत्पश्चात् महाभारत से भी देखेंगे। जब भगवान् श्रीराम रावण का वध कर देते हैं तो देवी सीता जी उनके समक्ष आती हैं तो वे परीक्षा लेने के उद्देश्य से उन्हें कहते हैं, देखें युद्ध कांड सर्ग 115- जब सीता जी ने ऐसा कठोर वचन सुना तो देवी सीता जी उत्तर देती हैं, देखें युद्ध कांड सर्ग 116- जैसे ही देवी सीता अग्नि में कूदने वाली होती हैं उन्हें भगवान् श्रीराम रोक लेते हैं और कहते हैं, देखें युद्ध कांड सर्ग 118- यहां श्लोक 13 के भाव में जो भगवन् शब्द है वह श्लोक में नहीं है, अर्...